आगरा इस्कॉन में तीन साल बाद हुआ श्रीहरि का दिव्य ‘नवांक श्रृंगार’, 1100 दीपों की दिव्य आभा से जगमगाया मंदिर परिसर

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आगरा। ताजनगरी आगरा के कमला नगर स्थित सुप्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर (इस्कॉन – ISKCON) में पुरुषोत्तम मास (अधिकमास) के पावन और दुर्लभ अवसर पर श्रद्धा और भक्ति का एक विहंगम दृश्य देखने को मिला। सनातन परंपरा के अनुसार, पूरे तीन वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भगवान श्रीहरि का अत्यंत अलौकिक और दिव्य ‘नवांक श्रृंगार’ किया गया।

इस परम पावन और दुर्लभ स्वरूप की एक झलक पाने मात्र के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा।

विशेष बात यह रही कि प्रतिदिन की शयन आरती से ठीक पहले मात्र 15 मिनट की अल्प अवधि के लिए ही भगवान के इस भव्य नवांक स्वरूप के दर्शन का परम सौभाग्य आम भक्तों को प्राप्त हुआ, जिसे पाकर श्रद्धालु पूरी तरह भाव-विभोर हो गए और अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान को निहारते रहे।

गोपी गीत से गूंजा परिसर, 1100 कपास दीपों से हुआ महा-दीपदान

पुरुषोत्तम मास के प्रथम दिन ही इस्कॉन मंदिर परिसर में ब्रज की पारंपरिक संस्कृति और भक्ति का एक अद्भुत माहौल जीवंत हो उठा। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भक्तों द्वारा गोपी गीत का सस्वर सामूहिक पाठ किया गया, जिसकी मधुर धुनों पर भक्त झूमने को मजबूर हो गए। इस पावन बेला पर मंदिर में एक विशेष महा-दीपदान उत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें तुलसी की सूखी डंडी पर कपास (रुई) को लपेटकर विशेष रूप से तैयार किए गए 1100 दीपों को प्रज्वलित कर ठाकुर जी को अर्पित किया गया। इन ग्यारह सौ दीपों की कतारबद्ध दिव्य रोशनी से संपूर्ण मंदिर प्रांगण अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठा, जिसने भक्तों को साक्षात द्वापर युग का अहसास करा दिया।

शयन आरती से पहले सजेगा नवांक स्वरूप: इस्कॉन अध्यक्ष अरविन्द प्रभु

इस विशेष धार्मिक अनुष्ठान के गूढ़ महत्व पर प्रकाश डालते हुए आगरा इस्कॉन मंदिर के अध्यक्ष अरविन्द प्रभु ने बताया कि ‘नवांक श्रृंगार’ कोई सामान्य श्रृंगार नहीं है, बल्कि यह विशेष रूप से केवल पुरुषोत्तम मास के पावन महीने में ही तीन वर्ष के कड़े अंतराल के बाद आयोजित किया जाता है। उन्होंने व्यवस्था की जानकारी देते हुए कहा कि यह दिव्य श्रृंगार इस पूरे महीने प्रतिदिन शयन आरती से ठीक पहले किया जाएगा, और अगली सुबह मंगला आरती संपन्न होने के बाद भगवान का यह स्वरूप पुनः सामान्य कर दिया जाएगा। रात्रि की शयन अवधि के दौरान भगवान इस अद्वितीय नवांक स्वरूप में ही विश्राम (शयन) करते हैं।

पौराणिक मान्यता: रात्रि में साक्षात वृंदावन वास करते हैं श्रीहरि

​अध्यक्ष अरविन्द प्रभु ने इसके पीछे छिपी प्राचीन पौराणिक मान्यता का जिक्र करते हुए बताया कि ऐसी पावन धार्मिक मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास की रातों में संपूर्ण आभूषणों और अलंकारों से सुसज्जित होकर श्रीहरि साक्षात अपनी परम प्रिय गोपियों से मिलने के लिए सूक्ष्म रूप से वृंदावन की कुंज गलियों और रासस्थली में वास करते हैं।

​इसी पावन रहस्य और लीला को याद करते हुए पुरुषोत्तम मास के दौरान प्रतिदिन शयन आरती से पूर्व इस विशेष नवांक श्रृंगार की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इसके साथ ही, पूरे महीने ठाकुर जी को ठंडक और शीतलता प्रदान करने के लिए हर दिन भिन्न-भिन्न और अत्यंत सुगंधित पुष्पों की सहायता से भव्य ‘फूल बंगला’ भी सजाया जाएगा।

उन्होंने आगे बताया कि सनातन धर्म में कार्तिक मास की ही तरह पुरुषोत्तम मास में भी दीपदान करने का अनंत गुणा फल और विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि इससे संपूर्ण वातावरण नकारात्मक शक्तियों से मुक्त होकर विशुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है।

उत्सव में ये प्रमुख श्रद्धालु रहे मौजूद

​इस अलौकिक पुरुषोत्तम मास उत्सव के प्रथम दिन ठाकुर जी की सेवा और महा-आरती में सिंधी और सनातन समाज के अनेक गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया। इस पवित्र अवसर पर मुख्य रूप से नितेश अग्रवाल, संजीव बंसल, राजेश मल्होत्रा, संजय कुकरैजा, सूरज, ओमप्रकाश अग्रवाल, विकास बंसल, राजेश उपाध्याय, शाश्वत नन्दलाल, राजप्रभु, अदिति गौरांगी, देव केशव सहित भारी संख्या में मातृशक्ति और सैकड़ों कान्हा भक्त उपस्थित रहे, जिन्होंने ठाकुर जी की भक्ति का अमिट आनंद प्राप्त किया।