आगरा की साझी विरासत पर प्रशासनिक ‘ग्रहण’: पालीवाल पार्क से आखिर क्यों गायब हुआ ऐतिहासिक होली मिलन?

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आगरा। ताजनगरी की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रहा ‘पालीवाल पार्क सर्वसमाज होली मिलन समारोह’ इस वर्ष अचानक गायब रहने से शहरवासियों में गहरा रोष है। होली के दूसरे दिन भैया दूज पर दशकों से आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आगरा के आपसी सौहार्द और साझा विरासत का प्रतीक था। लेकिन इस वर्ष नगर निगम की प्राथमिकताओं में बदलाव और प्रशासनिक खामोशी ने एक गौरवशाली परंपरा की बलि चढ़ा दी है।

दशकों पुरानी परंपरा पर ‘उदासीनता’ का प्रहार

​नगर महापालिका (अब नगर निगम) द्वारा वर्षों से आयोजित इस समारोह में शहर की हर संस्था, हर समाज और हर राजनीतिक दल एक मंच पर दिखाई देता था। पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप खंडेलवाल (ईको क्लब, पालीवाल पार्क) का कहना है कि यह आयोजन आगरा की सामाजिक एकता की मिसाल था। वे सवाल उठाते हैं कि जब यह परंपरा सरकारी संरक्षण में फल-फूल रही थी, तो अचानक इसे बंद करने की नौबत क्यों आई? क्या नगर निगम प्रशासन और नगर प्रमुख इस पर अपनी जवाबदेही स्पष्ट करेंगे?

​पार्क से दूरी और सड़क पर आयोजन का इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब इस परंपरा को कमजोर करने की कोशिश हुई हो। कुछ वर्ष पहले उद्यान विभाग द्वारा मैदान न देने पर नगर निगम को मजबूरन सड़क पर आयोजन करना पड़ा था। इस बार तो वैकल्पिक व्यवस्था की भी जहमत नहीं उठाई गई। चर्चा है कि यदि पार्क उपलब्ध नहीं था, तो क्या शहर के जिम्मेदार तंत्र के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था?

​निजी जश्न की होड़ में पीछे छूटा ‘सर्वसमाज’

इस वर्ष की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जहाँ 60-70 साल पुरानी सार्वजनिक होली मिलन की परंपरा दम तोड़ती दिखी, वहीं सत्ताधारी दल के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों के बीच अपने-अपने ‘निजी’ होली मिलन आयोजित करने की होड़ मची रही। सवाल यह उठता है कि जब सार्वजनिक और साझा मंच मौजूद था, तो उसे मजबूत करने के बजाय व्यक्तिगत प्रदर्शन को प्राथमिकता क्यों दी गई? क्या अब सामाजिक समरसता की बात केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगी?

11 मार्च को रस्म अदायगी की तैयारी

लगातार हो रही आलोचनाओं के बीच अब नगर निगम अपनी साख बचाने के लिए 11 मार्च को आवास विकास कॉलोनी में होली मिलन समारोह आयोजित करने जा रहा है। लेकिन सवाल फिर वही है पालीवाल पार्क की ऐतिहासिक परंपरा को क्यों तोड़ा गया? आवास विकास में होने वाला यह आयोजन पालीवाल पार्क की उस रूह और उस ऐतिहासिक संवाद परंपरा की भरपाई कैसे कर पाएगा?

​आगरा की सांस्कृतिक आत्मा इन सार्वजनिक परंपराओं में बसती है। यदि प्रशासनिक समन्वय की कमी और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से ऐसी कड़ियाँ टूटती हैं, तो यह केवल एक कार्यक्रम का नुकसान नहीं, बल्कि शहर के सामाजिक ताने-बाने पर प्रहार है। प्रशासन को यह समझना होगा कि परंपराएं केवल कागजों पर नहीं, बल्कि मैदानों पर जीवित रहती हैं।