ताजनगरी में 23 साल बाद गूंजी संत मोरारी बापू की अमृतमयी वाणी, भव्य श्रीरामकथा का हुआ अलौकिक शुभारंभ, देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालु हुए भावविभोर

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आगरा। रामनाम की मधुर ध्वनि, मानस की चौपाइयों का पाठ और श्रद्धा से सजल नेत्र… 23 वर्ष बाद जब संत मोरारी बापू की अमृतमयी वाणी ताजनगरी में गूंजी तो कथा पंडाल भक्ति और करुणा के भावों से भर उठा। किसी के हाथ में श्रीरामचरितमानस का गुटका था तो किसी के हाथ में जपमाला। बापू के साथ मानस की चौपाइयों का पाठ करते श्रद्धालु मानो रामभक्ति की धारा में बहते चले गए। भावुक हृदयों से निकले रामनाम ने वातावरण को आध्यात्मिक शांति और आनंद से सराबोर कर दिया।

जेपी वेडिंग ग्राउंड, फतेहाबाद रोड पर मंगलवार को करुणानिधान परिवार के तत्वावधान में नौ दिवसीय श्रीरामकथा का शुभारंभ वेद मंत्रों, शांति पाठ और मंगलाचरण के साथ हुआ। ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर कथा आरंभ होने के कारण मोरारी बापू ने प्रथम दिवस का विषय ‘मानस ऋषि पंचमी’ रखा। देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने बापू के प्रत्यक्ष दर्शन कर भावविभोर होकर कथा का रसपान किया।

ऋषि पंचमी पर ‘मानस ऋषि पंचमी’ का मंगलमय आरंभ

कथा का शुभारंभ वेद मंत्रों और शांति पाठ से हुआ। इसके बाद बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। मोरारी बापू ने गुरु वंदना, रघुनंदन वंदना और हनुमंत वंदना करते हुए श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों का पाठ आरंभ किया।

बापू ने कहा कि आगरा ऐतिहासिक नगरी होने के साथ-साथ आध्यात्मिक महत्व भी रखता है। 23 वर्ष बाद यहां आने का अवसर मिला है। विद्वानों से प्राप्त जानकारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने आगरा की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि गणेश उत्सव के बीच श्रीरामकथा का शुभारंभ होना केवल संयोग नहीं, बल्कि दैवीय आशीर्वाद है। इन दिनों जैन धर्म का पर्युषण पर्व भी चल रहा है और ऋषि पंचमी ऋषियों-मुनियों की वंदना का पावन दिन है। इसी विशेष आध्यात्मिक संयोग को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कथा का विषय ‘मानस ऋषि पंचमी’ रखा।

वाणी से जगत को जगाने वाला ऋषि, मौन से भीतर उतरने वाला मुनि

मोरारी बापू ने ऋषि और मुनि के स्वरूप का भावपूर्ण विवेचन करते हुए कहा कि श्रीरामचरितमानस में ऋषि शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत कम, जबकि मुनि शब्द का प्रयोग अधिक हुआ है। मानस में देवर्षि नारद, राजर्षि और ब्रह्मर्षि जैसे तेजस्वी व्यक्तित्वों का वर्णन मिलता है।

उन्होंने महर्षि वाल्मीकि, गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य और महर्षि भारद्वाज का स्मरण करते हुए कहा कि ये सभी श्रीरामचरितमानस के तेजस्वी नक्षत्र हैं। भगवान श्रीराम के अवतारी जीवन में विश्वामित्र का मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। भगवान की बाललीलाओं से लेकर आगे की यात्रा तक उनके मार्गदर्शन में अनेक प्रसंग जुड़े हैं।

बापू ने कहा कि तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस की प्रत्येक चौपाई और सोरठे में राम रस छिपा हुआ है। निरंतर वाणी से जगत को जागरूक करने वाला ऋषि है और मौन रहकर भीतर की गहराई में उतरने वाला मुनि है।

उन्होंने कहा कि जीवन में यह विवेक होना चाहिए कि कब बोलना है और कब मौन धारण करना है। वाणी और मौन दोनों का अपना महत्व है। इस रहस्य को सीखना हो तो हनुमान जी से सीखना चाहिए।

हनुमान जी और गणेश जी से लें विवेक की सीख

हनुमान जी और गणेश जी की समानताओं का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि दोनों ही भगवान शंकर के स्वरूप हैं और दोनों के शरीर पर सिंदूर का आवरण रहता है। मंदिरों में दोनों का विशेष महत्व है। हनुमान जी इतने स्वतंत्र हैं कि उनके मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां न भी हों तो भी कोई कमी नहीं रहती, क्योंकि उनके हृदय में स्वयं सीताराम विराजमान हैं।

उन्होंने कहा कि गणेश जी से विवेक का ज्ञान अवश्य लेना चाहिए। श्रीरामचरितमानस के प्रारंभिक प्रसंगों में शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चारों मठों का स्मरण करते हुए उन्होंने गणेश जी के जीवन से सीख लेने की प्रेरणा दी।

बापू ने कहा कि सत्संग करने वाला व्यक्ति जगत में पूजनीय बन जाता है। सूर्य को नमस्कार करें या न करें, लेकिन सूर्य से प्रकाश में जीना अवश्य सीखें। प्रकाश में जीने का संकल्प सदैव रखना चाहिए। सूर्य की उपासना से वाणी की तेजस्विता बढ़ती है।

‘सियाराममय सब जग जानी’ से मिटेगी निंदा और द्वेष की प्रवृत्ति

बापू ने कहा कि श्रीरामचरितमानस की चौपाई ‘सियाराममय सब जग जानी’ के भाव को यदि हम अपने भीतर उतार लें तो मन से निंदा, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विचार स्वतः समाप्त होने लगेंगे।

उन्होंने कहा कि उपनिषदों में पूरे जगत को ब्रह्ममय बताया गया है, जबकि श्रीरामचरितमानस में समस्त जगत को सीताराममय कहा गया है।

मानस की चौपाइयों के साथ भावविभोर हुए श्रद्धालु

कथा में पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं में से अनेक अपने साथ श्रीरामचरितमानस के गुटके और जपमाला लेकर आए थे। मोरारी बापू के साथ-साथ श्रद्धालुओं ने मानस की चौपाइयों का पाठ किया। 23 वर्ष बाद बापू को अपने बीच पाकर भक्त भावविभोर हो उठे। किसी के नेत्र आनंद से चमक रहे थे तो किसी की आंखों से भक्ति के आंसू छलक पड़े।

बापू की वाणी में रामकथा का मर्म सुनते हुए श्रद्धालु मानो अपने आराध्य के निकट पहुंच गए। कथा पंडाल में रामनाम, भक्ति और करुणा का ऐसा भावपूर्ण वातावरण बना कि हर हृदय राममय होता दिखाई दिया।

हनुमंत वंदना और हनुमान चालीसा से हुआ कथा का विश्राम

प्रथम दिवस की कथा का विश्राम विनय पत्रिका में वर्णित हनुमंत वंदना के साथ हुआ। बापू ने ‘मंगल मूर्ति मारुति नंदन’ का स्मरण किया और श्रद्धालुओं के साथ हनुमान चालीसा का पाठ किया।

मानस जी की आरती में शामिल हुए जनप्रतिनिधि और आयोजन समिति के सदस्य

कथा के प्रथम दिवस केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो एसपी सिंह बघेल, विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल, करुणानिधान परिवार के ललित गुप्ता, सतीश कुमार शाह, मनीष मित्तल, अंशुल गुप्ता और देवेश शाह सहित अन्य श्रद्धालुओं ने मानस जी की आरती की।

बुधवार से प्रतिदिन सुबह होगा रामकथा का रसपान

नौ दिवसीय श्रीरामकथा 23 सितंबर तक चलेगी। बुधवार से प्रतिदिन सुबह 10 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक मोरारी बापू रामकथा का वाचन करेंगे।