लखनऊ: सफेद कुर्ता-पायजामा पर लाल टोपी और लाल रंग का गमछा यह लंबे समय से समाजवादी पार्टी की पारंपरिक पहचान रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी वर्षों से इसी पहचान के साथ नजर आते रहे हैं। लेकिन अब समाजवादी पार्टी के ड्रेस कोड में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसमें नीले रंग की भी एंट्री हो चुकी है। हाल ही में 31 अगस्त को पार्टी के जिला और महानगर अध्यक्षों की एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान अखिलेश यादव खुद गले में लाल की जगह नीले रंग का गमछा डाले हुए दिखाई दिए थे।
इसके ठीक छह दिन बाद उन्होंने समाजवादी छात्र सभा के कार्यकर्ताओं का आधिकारिक ड्रेस कोड भी बदल दिया। अब इस छात्र संगठन से जुड़े कार्यकर्ता नीले रंग की शर्ट और नीली पैंट या फिर नीली टी-शर्ट और नीली जींस में नजर आएंगे, जिस पर पार्टी का चुनाव चिह्न ‘साइकिल’ और आधिकारिक लोगो भी मुद्रित होगा।
सपा के ड्रेस कोड में आए इस बड़े बदलाव के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में यह सवाल तैरने लगा है कि वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आखिर अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को बसपा के पारंपरिक रंग में क्यों रंग रहे हैं? ऐसा करके वह किस सियासी वर्ग को साधना चाहते हैं?
पीडीए फॉर्मूले को और धार देने की कोशिश
अखिलेश यादव पिछले कुछ चुनावों से लगातार ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सियासी फॉर्मूले पर जोर देते आ रहे हैं। अगर हालिया चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ एक ही सीट पर सिमट गई थी, और 2024 के लोकसभा चुनाव में तो उसका खाता भी नहीं खुल सका था। हालांकि, चुनाव परिणामों के बाद हुए राजनीतिक विश्लेषणों में यह स्पष्ट हुआ कि बसपा ने भले ही सीटें न जीती हों, लेकिन उसने कई लोकसभा सीटों पर भाजपा और सपा दोनों का चुनावी खेल जरूर बिगाड़ा था। मत प्रतिशत के लिहाज से वह चौथे स्थान पर रही थी। अब जब सभी दल 2027 के समीकरणों को दुरुस्त करने में जुटे हैं, तो अखिलेश द्वारा नीले रंग को अपनाना उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
1993 के सफल प्रयोग की यादें
भारतीय राजनीति में नीला रंग लंबे समय से दलित आंदोलन, बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और बहुजन राजनीति का प्रतीक माना जाता रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि साल 1993 में यूपी की राजनीति में सपा और बसपा के एक साथ आने का सफल उदाहरण अखिलेश के सामने है। तब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा संस्थापक कांशीराम के गठबंधन को भारी सफलता मिली थी, जिसमें सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें हासिल हुई थीं। दोनों दलों के आधार वोटरों के जुड़ने की ताकत को समझते हुए ही अखिलेश ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन किया था, हालांकि वह लंबे समय तक टिक नहीं सका।
बसपा पर सीधे हमले से क्यों बचते हैं अखिलेश?
पिछले करीब आठ वर्षों से सपा और बसपा की राजनीतिक राहें पूरी तरह अलग हैं, इसके बावजूद अखिलेश यादव अमूमन बसपा पर सीधे हमले करने से हमेशा बचते आए हैं। वह लगातार पीडीए फॉर्मूले के तहत अपने पारंपरिक पिछड़ा-अल्पसंख्यक वोटरों के साथ बसपा के मुख्य आधार माने जाने वाले दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के ड्रेस कोड में नीले रंग को प्रमुखता देना एक बड़ा संदेश है, खासकर तब जब बसपा का जमीनी प्रभाव पहले के मुकाबले कुछ कमजोर हुआ है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा का यह नया रंग चुनावी मैदान में कितना रंग जमा पाता है।
