आगरा में एडीए के खिलाफ किसानों का ‘आर-पार’ का महा-आंदोलन: कमिश्नर और एडीए दफ्तर का घेराव, तालाबंदी की चेतावनी

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आगरा: ताजनगरी आगरा में आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) द्वारा इनर रिंग रोड के तृतीय चरण (Third Phase) के लिए अधिग्रहित की गई जमीनों को वापस दिलाने की मांग को लेकर स्थानीय किसानों का आक्रोश सोमवार को पूरी तरह से फूट पड़ा। अपनी पुश्तैनी जमीनों को बचाने के लिए सैकड़ों की संख्या में आंदोलित किसान कमिश्नरी (आयुक्त कार्यालय) और एडीए मुख्यालय पहुंचे और प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

प्रदर्शनकारी किसानों ने तीखे आरोप लगाते हुए कहा कि एडीए के अधिकारी अन्नदाताओं के साथ सरेआम धोखा और शोषण कर रहे हैं, जिससे प्रदेश की जनप्रिय सरकार की छवि धूमिल हो रही है। किसानों ने प्रशासन को दोटूक लहजे में चेतावनी दी कि यदि उनकी अधिग्रहित जमीनें तत्काल वापस नहीं की गईं, तो अब जिला मुख्यालय पर आर-पार का ऐतिहासिक संघर्ष होगा, जिससे किसान पीछे हटने वाले नहीं हैं।

​कैबिनेट मंत्री बेबीरानी मौर्य के नेतृत्व में सीएम से मिला था प्रतिनिधिमंडल

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे किसान नेताओं ने दावा किया कि गत 24 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस संवेदनशील मामले में बेहद स्पष्ट और कड़े आदेश जारी किए थे। मुख्यमंत्री ने कहा था कि यदि विकास कार्यों के लिए किसानों की जमीन अपरिहार्य है, तो उन्हें वर्तमान बाजार दर (सर्किल रेट) के अनुसार उचित मुआवजा दिया जाए, और यदि उस जमीन की विभाग को आवश्यकता नहीं है, तो उसे तत्काल किसानों को वापस सौंप दिया जाए।

किसानों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल प्रदेश की कैबिनेट मंत्री बेबीरानी मौर्य के नेतृत्व में स्वयं मुख्यमंत्री से मिला था। इसके बावजूद, जिला प्रशासन और एडीए के अधिकारी मुख्यमंत्री के उन स्पष्ट आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने में मग्न हैं।

​अधिकारियों के बहाने पर भड़के किसान, मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप ने संभाला मोर्चा

​पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, सोमवार को आयुक्त कार्यालय में मंडलायुक्त, एडीए उपाध्यक्ष, एसएलओ (विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी) और एसडीएम सदर के साथ किसान प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित थी। जब सैकड़ों किसान कतारबद्ध होकर आयुक्त कार्यालय पहुंचे, तो वहां उन्हें बताया गया कि एडीए के नए सचिव और एसएलओ ने हाल ही में अपना कार्यभार संभाला है, इसलिए मामले को समझने के लिए उन्हें कुछ समय दिया जाना चाहिए।

अधिकारियों का यह टालमटोल वाला रवैया सुनते ही किसान बुरी तरह भड़क उठे और परिसर में ही उग्र नारेबाजी शुरू कर दी। माहौल बिगड़ता देख मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप ने संवेदनशीलता दिखाते हुए किसानों के प्रतिनिधिमंडल को दोबारा अपने कक्ष में बुलाया। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल मौके से ही एडीए सचिव और एसएलओ से फोन पर सीधी बातचीत की और इस भूमि विवाद का बिना किसी देरी के त्वरित व ठोस समाधान निकालने के कड़े निर्देश दिए।

​कानून की धारा 22/24 और 33/34 के तहत जमीन वापस करने की मांग

कमिश्नरी पर हंगामे के बाद प्रख्यात किसान नेता श्याम सिंह चाहर के नेतृत्व में सैकड़ों किसानों का जत्था एडीए कार्यालय की ओर कूच कर गया। वहां करीब एक घंटे तक एडीए सचिव और भूमि अध्याप्ति अधिकारी के बीच बंद कमरे में तीखी वैचारिक वार्ता चली।

किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने विधिक पक्ष रखते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 22/24 में यह स्पष्ट रूप से निहित है कि यदि अधिग्रहित की गई जमीन पर पांच वर्षों तक कोई भौतिक निर्माण कार्य या विकास कार्य शुरू नहीं होता है, तो वह जमीन मूल किसानों को वापस करने का विधिक अधिकार स्वतः जागृत हो जाता है।

उन्होंने रोष जताते हुए कहा कि किसान अपनी जमीनों से संबंधित सभी आवश्यक राजस्व प्रमाण पहले ही सौंप चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद एडीए अधिकारी फाइल दबाकर बैठे हैं। किसानों ने आरोप लगाया कि एडीए के भ्रष्टाचार और हठधर्मिता के कारण जमीन देने वाले मूल काश्तकारों के अधिकारों का खुलेआम हनन किया जा रहा है।

भूमिहीन किसानों को मिले 40 वर्गमीटर के भूखंड और सरकारी नौकरी

वार्ता के दौरान श्याम सिंह चाहर ने किसानों की ओर से एक मजबूत मांग पत्र भी प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने मांग रखी कि इस परियोजना के कारण जो किसान पूरी तरह से भूमिहीन (जमीन से वंचित) हो चुके हैं, उन्हें पुनर्वास नीति के तहत 40 वर्गमीटर के आवासीय भूखंड आवंटित किए जाएं और परिवार की शैक्षणिक पात्रता के आधार पर उन्हें तत्काल सरकारी नौकरी दी जाए। उन्होंने संगीन आरोप लगाया कि कुछ एडीए अधिकारी किसानों की कीमती जमीनों के सौदों में दलाली कराने के कुत्सित प्रयास में लगे हुए हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

​वहीं, आलू विकास समिति के प्रदेश सचिव लक्ष्मी नारायण बघेल ने उपस्थित अधिकारियों को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा कि शांतिप्रिय किसानों को हल्के में लेने की भूल कतई न की जाए, अन्यथा आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन करते हुए एडीए कार्यालयों की पूर्ण तालाबंदी कर दी जाएगी।

उन्होंने तकनीकी पक्ष रखते हुए कहा कि कानून की धारा 33 और 34 के तहत यदि अधिग्रहित भूमि तय समय सीमा में निर्धारित जनहित के कार्य में उपयोग नहीं हो रही है, तो उसे सीधे तौर पर किसानों के नाम वापस म्यूटेट (दर्ज) किया जा सकता है।

16 वर्षों से जमीन पर हमारा कब्जा, अब तेज होगा आंदोलन

धरने पर बैठे किसानों ने दो टूक कहा कि अब एडीए प्रशासन की तानाशाही और मनमानी ताजनगरी की धरती पर नहीं चलने दी जाएगी। किसानों का तर्क था कि अधिग्रहण की कागजी प्रक्रिया को शुरू हुए आज 16 वर्ष से अधिक का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन आज भी उस जमीन पर भौतिक रूप से कब्जा और खेती केवल किसानों की ही है। इससे यह पूरी तरह प्रमाणित होता है कि अधिग्रहित भूमि का कोई उपयोग नहीं किया गया।

इस महा-आंदोलन और घेराव के दौरान मुख्य रूप से किसान नेता श्याम सिंह चाहर, लक्ष्मी नारायण बघेल, प्रमोद कुमार, महावीर चार, रघुनाथ शर्मा, श्री भगवान, विनोद कुमार, आशुतोष महेश्वरी, नागेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह सिनवार, लक्ष्मण सिंह, मुकेश पाठक, लाखन सिंह, वासुदेव कुशवाहा, नरोत्तम शर्मा, बंटू राम, विजय शर्मा, मनोज कुमार, कन्हैया, सोनू, धर्म कुशवाहा, पप्पू सिंह, हर प्रसाद, हरि सिंह, श्रीचंद्र चार, विवेक कुमार, आशुतोष, विनोद, महेश, विशंभर, लखन सिंह, सलीम खान, जावेद खान, अशोक कुमार, नागेंद्र सिंह, वेदों पंडित, सचिन सिकरवार, सत्यवीर सिंह, धर्मेंद्र कुमार, कृष्ण शर्मा, रविंद्र कुमार, हरीश कुमार, रवि कुमार, दया किशन, जगदीश शर्मा, राम सिंह, श्याम सेठ सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों से आए सैकड़ों पीड़ित किसान और उनके परिजन एकजुटता के साथ उपस्थित रहे।