वाराणसी: मोक्ष नगरी काशी में शनिवार को आस्था और इतिहास का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। 17वीं शताब्दी से चली आ रही उस प्राचीन परंपरा का एक बार फिर निर्वहन किया गया, जो काशी की अटूट श्रद्धा और संघर्ष की प्रतीक है। ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार पर संतों ने माँ श्रृंगार गौरी के विग्रह का विधि-विधान से पूजन किया और इसके साथ ही नौ दिवसीय विशेष रामकथा का शंखनाद हुआ।
1669 के विध्वंस के बाद शुरू हुई थी यह रीत
इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें साल 1669 के उस दौर से जुड़ी हैं जब औरंगजेब के आदेश पर आदि विश्वेश्वर मंदिर को क्षति पहुंचाई गई थी। उस कठिन समय में भी काशी के ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी और माँ श्रृंगार गौरी के विग्रह के अवशेषों को पश्चिमी दीवार के समीप स्थापित कर पूजा जारी रखी। मान्यता है कि तभी से बाबा विश्वनाथ को प्रसन्न करने के लिए उन्हें रामकथा सुनाने का संकल्प लिया गया था।
30 साल के अंतराल के बाद भव्य वापसी
बता दें कि साल 1991 में तत्कालीन सरकार द्वारा सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इस पूजन पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। लगभग तीन दशकों तक यह परंपरा केवल प्रतीकात्मक रूप में ही जीवित रह सकी। हालाँकि, पिछले तीन वर्षों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इस आयोजन को फिर से पूर्ण भव्यता और विधि-विधान के साथ शुरू किया गया है।
पश्चिमी गैलरी में गूंज रहे हैं श्री राम के जयकारे
अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि यह रामकथा काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर की उसी पश्चिमी गैलरी में हो रही है, जो ज्ञानवापी की दीवार से सटकर गुजरती है।
उन्होंने कहा: “यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि उस संकल्प की विजय है जिसने सदियों के संघर्ष के बावजूद अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। एक ओर श्रृंगार गौरी का पूजन और दूसरी ओर बाबा को समर्पित रामकथा, यह दृश्य काशी की आत्मा को दर्शाता है।”

