बालिका शिक्षा की ‘क्रांति’ के 18 साल: लखनऊ में गूँजी ‘एजुकेट गर्ल्स’ की सफलता की कहानी; डिप्टी CM ने सराहा जमीनी संघर्ष

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​लखनऊ: बालिका शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो रही संस्था ‘एजुकेट गर्ल्स’ ने अपनी स्थापना के 18 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर राजधानी लखनऊ में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में संस्था के जमीनी प्रभाव और ‘टीम बालिका’ के संघर्षों को प्रदर्शित किया गया। विशेष बात यह है कि इसी वर्ष संस्था को एशिया के सर्वोच्च सम्मान ‘रेमन मैग्सेसे पुरस्कार 2025’ से नवाजा गया है, जिसे ‘एशिया का नोबेल’ भी कहा जाता है।

​”मिशन शक्ति के साथ खड़ा है एजुकेट गर्ल्स”: डिप्टी CM ब्रजेश पाठक

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संस्था की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक बेटी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, “2017 के बाद यूपी में शिक्षा के ढांचे में बड़ा बदलाव आया है। कायाकल्प योजना और कस्तूरबा गांधी विद्यालयों के माध्यम से ड्रॉपआउट दर (स्कूल छोड़ने वाली छात्राओं की संख्या) लगातार कम हो रही है। ‘एजुकेट गर्ल्स’ जैसे साझेदार हमारी इस मुहिम को घर-घर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।”

​23 जिलों में बेटियों को फिर मिला स्कूल का रास्ता

माध्यमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त राज्य परियोजना निदेशक विष्णु कांत पांडेय ने बताया कि संस्था के सहयोग से लगभग 23 जिलों में स्कूल से बाहर रह गई बालिकाओं की पहचान कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा गया है। उन्होंने ‘विद्या कार्यक्रम’ और ओपन स्कूलिंग के जरिए उन किशोरियों की शिक्षा निरंतर रखने के प्रयासों को रेखांकित किया जो सामाजिक या आर्थिक कारणों से पढ़ाई छोड़ चुकी थीं।

​स्वयंसेवकों का साहस: ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ अग्रिम पंक्ति के नायकों को समर्पित

‘एजुकेट गर्ल्स’ की सीईओ गायत्री नायर लोबो ने रेमन मैग्सेसे पुरस्कार का श्रेय अपने 55,000 से अधिक ‘टीम बालिका’ स्वयंसेवकों को दिया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “यह सम्मान उन फील्ड टीमों का है जो घर-घर जाकर गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ती हैं। हमारी यात्रा एक जमीनी पहल से शुरू होकर आज एक राष्ट्रीय शक्ति बन गई है, जो सबसे वंचित बालिकाओं को ‘ज्ञान का पिटारा’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए स्कूल वापस ला रही है।”

​प्रेरणा की मिसाल: निर्मला यादव और सोनम की कहानियाँ

आयोजन में उन स्वयंसेवकों और शिक्षार्थियों की कहानियों ने सबका दिल जीत लिया जिन्होंने मुश्किलों को मात दी:

​निर्मला यादव: कम उम्र में शादी और विरोध के बावजूद हार नहीं मानी। किताबें नष्ट कर दी गईं, फिर भी संघर्ष जारी रखा और आज बीए व एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई पूरी कर दूसरों के लिए मिसाल बनीं।

​सोनम (बदायूं) और प्रांचल (सोनभद्र): इन स्वयंसेवकों ने साझा किया कि कैसे ड्रॉपआउट बच्चों को शिक्षा से जोड़ना उनके जीवन को एक बड़ा उद्देश्य और आत्मविश्वास दे रहा है।

​चुनौतियां अब भी बरकरार

पैनल चर्चा के दौरान संचालन निदेशक विक्रम सिंह सोलंकी ने बताया कि बाल विवाह, घरेलू जिम्मेदारियाँ और पुराने सामाजिक नजरिए आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि, संस्था के स्वयंसेवक इन बाधाओं को पार कर समुदायों में जागरूकता की नई अलख जगा रहे हैं।