क्या है ‘इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया’, कैसे मिली इसको छापने की प्रेरणा

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कैसे मिली इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया छापने की प्रेरणा

उत्तराखंड के मुक्तेश्वर के निवासी और डाटानेट इंडिया के संपादक-निदेशक 64 वर्षीय डॉ आरके ठुकराल ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि जब से मैंने कुमाऊं विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर्स और औद्योगिक अर्थशास्त्र पर पीएचडी की पढ़ाई पूरी की है, तभी से भारत पर सांख्यिकीय अध्ययनों ने मुझे आकर्षित किया है. मैंने अपनी थीसिस और राज्य पर आधारित अन्य अध्ययनों से तैयार उत्तर प्रदेश सांख्यिकीय कैलेंडर प्रकाशित किया.

1995 से 2000 तक प्रिंट मीडिया में करते हुए मैंने अनुसंधान केंद्र की शुरुआत की. अपने काम के दौरान मैं मदन बहल (मुंबई स्थित एडफैक्टर्स पीआर के एमडी) से मिला और 2000 में हमने डाटानेट इंडिया की शुरुआत की. इसके बाद नवंबर 2000 में इंडियास्टेट प्रोजेक्ट लॉन्च किया, लेकिन 2004 में ही इस परियोजना को मान्यता मिली, जब विश्व बैंक ने डेटा की मांग की.

क्या है इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया

इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया वर्ष 1952 से वर्ष 2019 तक सभी संसदीय चुनावों पर वर्ष-वार व्यापक विवरण प्रस्तुत करने वाली अपनी तरह की एक अनोखी पुस्तक है. इसमें जनवरी वर्ष 2022 तक का अपडेट भी शामिल है. इस बारे में पुस्तक के संपादक डॉ आरके ठुकराल का कहना है कि इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया का पहला एडिशन बहुत सफल रहा. हमें अपने पाठकों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया भी मिली. इस कारण आम चुनाव वर्ष 2019 के बाद इसका अपडेटेड वर्जन लाने का फैसला किया.

2019 के चुनाव में 91 करोड़ से अधिक मतदाता

डॉ आरके ठुकराल आगे कहते हैं कि भारत के मतदाता वर्ष 2019 के आम चुनाव में 91 करोड़ से अधिक थे, जो अमेरिका और पश्चिमी यूरोप की संयुक्त जनसंख्या से भी अधिक है. पिछले दशक के दौरान आम चुनावों की तेज़ी से विकसित होने वाली गतिशीलता को देखते हुए इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया का लेटेस्ट वर्जन भारतीय संसदीय चुनावों के बारे में एक अनिवार्य और सूचनाप्रद संग्रह होगा.

शोधकर्ताओं, वकीलों और शिक्षाविदों के लिए काम की चीज

इलेक्शन एटलस ऑफ इंडिया भारतीय संसदीय चुनावों के बारे में जानकारी की एक क्रमवार व्यवस्थित प्रकाशन है. इसके अलावा, एटलस में बेहतर और सरल समझ के लिए ऐतिहासिक फोटो कोलाज, संछिप्त विवरण, विषयगत मानचित्रों, ग्राफ, चार्ट आदि का उपयोग किया गया है.

इस पुस्तक में परिसीमन के बाद और राज्यों के पुनर्गठन के दौरान उप-चुनावों और निर्वाचन क्षेत्रों में परिवर्तन के बारे में ऐतिहासिक आंकड़ों पर भी प्रकाश डाला गया है. यह पुस्तक सूचना का एक समृद्ध साधन एवं शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, लोकतंत्र के अधिवक्ताओं और चुनाव कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी आंकड़ों को सरल तरीकें से समझाने का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनेगा.

-एजेंसी

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