​”गाली देते जैन जी नहीं चाहिए, हमें संस्कारवान भारतीय चरित्र चाहिए”: सेठ पदम चंद जैन संस्थान में ‘जेन ज़ी, एआई और नारी सशक्तिकरण’ पर गोष्ठी

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आगरा शहर के सेठ पदम चंद जैन संस्थान के सभागार में हाल ही में “जेन ज़ी (Gen Z), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और नारी सशक्तिकरण” जैसे समसामयिक और महत्वपूर्ण विषयों पर एक भव्य विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ. शशि तिवारी और शिवरंजिनी द्वारा संपादित पुस्तक “मां जैसा कोई नहीं जीया: एक युग” का गरिमामयी विमोचन भी संपन्न हुआ। गोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने आधुनिक तकनीक, युवाओं की बदलती जीवनशैली और भारतीय संस्कृति में नारी की भूमिका पर खुलकर अपने विचार रखे।

​”परिवार को नारी की पहले जरूरत है, उसे प्राथमिकता दें”

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. महेश शर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर या भागकर किसी नई नकली दुनिया का निर्माण करके हम इस मौजूदा दुनिया को कभी नहीं बदल सकते। उन्होंने जोर देकर कहा कि नारी इस सृष्टि की सृजक है और वह बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन परिवार को सबसे पहले नारी की आवश्यकता होती है, इसलिए उसे अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए।

बच्चे की पहली गुरु और शिक्षक उसकी मां होती है, इसलिए एक बच्चे को बेहतरीन नागरिक बनाना ही समाज की सबसे बड़ी भलाई है। जंतर-मंतर के संदर्भों का जिक्र करते हुए उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि हमें उच्छृंखल व्यवहार करने वाले या गालियां देने वाले लोग नहीं चाहिए, बल्कि हमें संस्कारवान भारतीय चरित्र की आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर केवल खानापूरी हो रही है और कई बार महिलाओं द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का सही निर्वाह नहीं किया जा रहा है।

​एआई (AI) के प्रभावों पर चर्चा करते हुए उन्होंने चेताया कि जिस प्रकार कैलकुलेटर के आने से लोगों की गणितीय बौद्धिक क्षमताओं का ह्रास हुआ है, ठीक उसी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी मानव जीवन पर कई खतरनाक प्रभाव डालेगा। इसके साथ ही उन्होंने पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि यह एक अद्भुत संयोग है कि ‘जीया’ का जन्म 30 जून को हुआ था और वह 30 जून को ही 95 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहकर गईं।

नारी शक्ति और परंपराओं पर वक्ताओं के विचार

​कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में नारी हमेशा से अत्यंत सशक्त और देवी का स्वरूप रही है। जैसे-जैसे युग बदला है, वैसे-वैसे मान्यताएं भी बदली हैं, और आज के इस आधुनिक युग के अनुरूप नारी को सशक्तिकरण की तमाम नई चुनौतियों को स्वीकार करना होगा। उन्होंने कवयित्री डॉ. शशि तिवारी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपने पुरखों पर गर्व करने की पुरानी परंपरा को निभाते हुए मां के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोने का बेहद प्रेरणादायक कार्य किया है।

​मुख्य वक्ता प्रो. कमलेश नागर ने जेन ज़ी (Gen Z) पीढ़ी पर बात करते हुए कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर जिस तरह की तस्वीरें सामने आई हैं, वहां गलियां देती किशोरियों या युवतियों के आचरण को हम किसी भी कीमत पर ‘नारी सशक्तिकरण’ नहीं कह सकते। सड़क पर उतरकर उच्छृंखल व्यवहार करना महिला सशक्तिकरण नहीं कहलाता।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे दिलीप रघुवंशी ने कहा कि हर दौर में पीढ़ियों के विचार अलग-अलग होते हैं और पुरानी पीढ़ी हमेशा नई पीढ़ी में कमियां निकालती आई है। आज की ‘जेन ज़ी’ पीढ़ी के युवा हमारी सोच से बहुत आगे की प्लानिंग करके चल रहे हैं, और हम उनसे भी बहुत कुछ नया सीख सकते हैं।

साहित्यकारों और वक्ताओं के संस्मरण

प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कुसुम चतुर्वेदी ने कहा कि जंतर-मंतर के दृश्यों को देखकर ऐसा लगा कि वह पूरा आंदोलन सही सलीके और अनुशासन से नहीं चलाया गया, जिसके लिए हमारी आज की आभासी (वर्चुअल) दुनिया काफी हद तक जिम्मेदार है। जीया को याद करते हुए उन्होंने कहा कि “कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिन्हें यादों में हमेशा के लिए ठहर जाने का हुनर आता है।”

इस दौरान उन्होंने अपनी एक कविता भी सुनाई— “जब जब मिली मैं आपसे मुझको खुशियां मिली अपार, कैसे व्यक्त करूं मैं उनको जिनका नहीं आर-पार…!”

​डॉ. ज्योत्सना रघुवंशी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हमारे जीवन में बहुत बड़ा और तीव्र बदलाव ला रहा है। एक तरफ जहाँ एआई महिला सुरक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहद मददगार साबित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ यदि हम नई तकनीक के साथ कदमताल करके नहीं चलेंगे तो बहुत पीछे छूट जाएंगे।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की ताकत को हमें स्वीकार करना ही होगा, लेकिन इसके खतरनाक दुष्प्रभावों से बचना बेहद जरूरी है। आज के बढ़ते साइबर अपराधों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक रहना अनिवार्य है। उन्होंने वर्तमान माहौल को बयां करते हुए कहा— “बीच भँवर में फंस गई नैया, खेवनहार कहां पर हो!”

​वरिष्ठ साहित्यकार राज बहादुर राज ने कहा कि आज के इस भौतिकवादी दौर में केवल किताबी शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कारों का होना भी बहुत आवश्यक है। उन्होंने वैदिक काल का हवाला देते हुए बताया कि उस काल में भारतीय नारी अत्यंत सशक्त हुआ करती थी, लेकिन मध्यकाल में जब विदेशी आक्रांताओं ने देश पर शासन किया, तब जाकर भारतीय नारी की स्थिति ‘अबला’ जैसी दयनीय हो गई।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथ ‘यशोधरा’ की पंक्तियों— “अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी”— का जिक्र करते हुए उन्होंने इसके विपरीत डॉ. शशि तिवारी द्वारा लिखी गई सशक्त कविताओं की पंक्तियों को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

काव्य पाठ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां

पुस्तक की लेखिका एवं कवयित्री डॉ. शशि तिवारी ने अपनी मां ‘जीया’ के जीवन, व्यक्तित्व और उनके कृतित्व को अपने शब्दों में बयां करते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल उनकी कोई वैयक्तिक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर की तमाम माताओं को समर्पित एक महान कृति है।

इस अवसर पर प्रसिद्ध गायिका-कवयित्री शिवरंजनी तिवारी ने अपनी भावुक कविता के जरिए समां बांध दिया—
“तुम ही घर की धड़कन थीं, तुम ही परिवार का मान,
तुम सब रिश्तों की डोरी, तुम ही आन बान और शान।
हमेशा यादों में ज़िंदा रहोगी, हमारी प्यारी जीया,
सादा जीवन काया कोरी, तुम ही हमारा अभिमान।”

इसके साथ ही शिवरंजनी ने डॉ. शशि तिवारी द्वारा रचित माँ को समर्पित एक बेहद लोकप्रिय गीत भी सुनाया— “दुनियाँ में माँ जैसा कोई नहीं है। माँ मीठी दूध-मलाई जैसी है, सर्दी में ऊन-सलाई जैसी है, माँ की रोटी जैसा कोई नहीं है…।”

​कार्यक्रम के दौरान प्रसिद्ध गायक परमानंद ने पारंपरिक हिंडोला गायकी की शानदार प्रस्तुति देते हुए एक सुरीली मल्हार सुनाई, जिसमें भगवान स्वरूप ने ढपली पर उनकी बहुत सुंदर संगत की।

इन प्रस्तुतियों के बीच “झूलन चलो हिंडोरला वृषभान नंदिनी, सुंदर कदंब की डाली, झूला पढ़ रहियो है प्यारी…!” के भजनों ने पूरे सभागार को भक्तिमय और सावन के उल्लास से भर दिया। इसके अलावा कार्यक्रम में दो लघु फिल्मों का भी प्रदर्शन किया गया, जिनका बेहतरीन लेखन, निर्देशन और निर्माण शिवरंजनी तिवारी और मेजर शेखर द्वारा किया गया था।

​कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. ब्रजेश रावत उपस्थित रहे। इसके अलावा संजय तिवारी, पं. योगेश शर्मा योगी, अनिल जैन और डॉ. महेश धाकड़ जैसे वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर ब्रिगेडियर सौरभ तिवारी, कर्नल राजीव तिवारी, रजनी पांडेय, रश्मि शांडिल्य, शिप्रा तिवारी, रूपम, भावना, डॉ. विशाल, ममता, कुमकुम रघुवंशी, संजय शर्मा, विनोद दीक्षित, सुधांशु पांडेय, डॉ. नीलम भटनागर, अनिल जैन, संजय गुप्त, शरद गुप्त, राजकुमार दीक्षित, राजेंद्र शर्मा, डॉ. रुचिरा प्रसाद, स्वाति माथुर, श्वेता, जितेंद्र दीक्षित, आचार्य उमा शंकर और अनिल अरोड़ा ‘संघर्ष’ सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे। अंत में धन्यवाद ज्ञापन तिवारी परिवार के सदस्यों द्वारा किया गया।