यह महज़ पत्रकारिता के गिरते स्तर का रोना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के मलबे पर खड़े एक संगठित अपराध की डरावनी कहानी है। आज मोबाइल कैमरे, कौड़ियों के भाव मिलने वाले आई-कार्ड और सस्ते चाइनीज माइक जनसेवा के उपकरण नहीं, बल्कि अवैध वसूली के सबसे घातक हथियार बन चुके हैं। एक ऐसा विषैला ‘ईकोसिस्टम’ तैयार हो गया है जहाँ खबरें संकलित नहीं होतीं, बल्कि सौदों की नीलामी होती है और सच को उजागर करने के बजाय उसे दबाने की कीमत वसूली जाती है।
यह एक ऐसी ‘डिजिटल डकैती’ है जिसने व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर दिया है। आज कस्बों और छोटे शहरों में आई-कार्ड बेचने वाली दुकानें किराने की दुकान से भी ज्यादा सक्रिय हैं। ‘नेशनल’ और ‘एंटी-करप्शन’ जैसे भारी-भरकम शब्दों के लेबल लगाकर मात्र दो से दस हजार रुपये में ‘स्टेट हेड’ या ‘चीफ इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर’ की पदवियां बांटी जा रही हैं। बिना किसी चरित्र सत्यापन या शैक्षणिक योग्यता के यह चमकदार कार्ड पहनकर जब लोग निकलते हैं, तो शुरू होता है ब्लैकमेलिंग का नंगा नाच। सरकारी दफ्तरों में धड़धड़ाते हुए घुसना, निर्माणाधीन दीवारों को कुरेदकर भ्रष्टाचार का शोर मचाना और स्कूलों-अस्पतालों में ‘स्टिंग’ के नाम पर धमकाना अब जनहित नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे ‘सेवा-पानी’ तय करने का जरिया बन गया है।
हैरत की बात यह है कि इस डिजिटल आतंक की जद में अब कानून के रखवाले यानी पुलिसकर्मी भी हैं। कल तक जो अपराधी थानों की फाइलों में ‘हिस्ट्रीशीटर’ थे, आज वे ‘प्रेस’ की तख्ती लगाकर उसी थाने की दहलीज पर धमक रहे हैं। यह ‘अपराधी-टर्न-रिपोर्टर’ अब कलम से नहीं, बल्कि कैमरे को एक आधुनिक कट्टे की तरह इस्तेमाल कर व्यवस्था को मानसिक बंधक बना रहे हैं। यह राज्य की सत्ता और कानून के इकबाल को खुली चुनौती है।
सोशल मीडिया ने इस अराजकता को वैश्विक मंच दे दिया है। बिना किसी एडिटोरियल गाइडलाइन या लाइसेंस के रातों-रात खड़े हुए ‘न्यूज नेटवर्क’ व्यूज की भूख में सनसनीखेज झूठ और दबाव की दुकानें चला रहे हैं। इसी फर्जी कार्ड की आड़ में कहीं गाड़ियों से शराब की तस्करी हो रही है, तो कहीं वीआईपी सुरक्षा घेरों में घुसपैठ की जा रही है।
हालाँकि कानून की किताबें जालसाजी की धाराओं से भरी हैं, लेकिन डिजिटल मीडिया के अनियंत्रित प्रसार पर किसी स्पष्ट नियंत्रण के अभाव में ये बेअसर हैं। इस अराजकता का सबसे बड़ा खामियाजा उन ईमानदार पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है जो जान जोखिम में डालकर सच लिखते हैं, क्योंकि आज समाज की नजर में हर माइक और कैमरा शक के दायरे में है।
अब समय आ गया है कि पहचान की इस ‘मंडी’ पर ताला जड़ा जाए। समाधान केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि एक ऐसी जवाबदेह व्यवस्था है जहाँ हर मीडिया कार्ड का डिजिटल सत्यापन अनिवार्य हो और इसके दुरुपयोग को गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए।
प्रशासन को डर से बाहर निकलना होगा और जनता को समझना होगा कि विश्वसनीयता गले में टंगे कार्ड से नहीं, बल्कि आचरण से आती है। यदि आज इस संक्रमण को नहीं रोका गया, तो पत्रकारिता और ब्लैकमेलिंग के बीच की धुंधली रेखा पूरी तरह मिट जाएगी और उस दिन सबसे बड़ी हार ‘सच’ की होगी। सरकार और पत्रकार संगठनों को मिलकर एक व्यावहारिक आचार संहिता बनानी होगी, वरना पत्रकारिता का यह ‘धंधा’ लोकतंत्र के वजूद को ही निगल जाएगा।
साभार- महेश झालानी-

