आफताब के बहाने संस्कारियों के ‘प्यार’ को भी याद कर लीजिए

अन्तर्द्वन्द
संजय कुमार सिंह

श्रद्धा और आफताब के बहाने देश को शिक्षा देने वालों की कमी नहीं है। शिक्षा यह होती कि प्रेम करो पर संभल कर, जान बचाना महत्वपूर्ण है, अगर बात न बने तो अलग हो जाओ, अगर कोई व्यवहार बुरा लगा हो और बदला लेने का मन हो, सीख देने की इच्छा हो तो अकेले कोशिश मत करो – तो बात अलग थी। सीख यह दी जा रही है कि धर्म विशेष के लोग लड़कियों को प्रेम जाल में फंसा कर हत्या कर देते हैं। इसलिए धर्म विशेष के लोगों से बच कर रहो। ऐसे जैसे अपने धर्म के सब लोग संत हैं जबकि सच्चाई यह है कि संत के भेष में कई बलात्कारी जेल में और बाहर भी हैं।

भारत जैसे धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में ऐसी बातें करना कानून का उल्लंघन है और बहुत हाल तक धर्म का नाम इस तरह नहीं लिया जाता था। और तो और, मंदिर मस्जिद की जगह धार्मिक स्थल या पूजा स्थल लिखा जाता था इसी तरह धर्म बताने से बचने के लिए आरोपियों के नाम नहीं लिये जाते थे। अब एक धर्म को नीचा दिखाने और एक को खास बताने के लिए यह सब खुले आम हो रहा है और जान बूझकर एक धर्म और धर्म से जुड़े लोगों को नीचा दिखाया जा रहा है। पुलिस कार्रवाई की बात तो तब होती जब ऐसा कोई एक-दो व्यक्ति अपराधी मानसिकता से करता।

स्थिति यह हो गई है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अपने धर्म की बुराइयों या मामलों को भूल कर (या छिपाकर) दूसरे धर्म के लोगों के किसी एक काम के आधार पर पूरे धर्म को दोषी ठहराता है। बिना जाने। उदाहरण के लिए तीन तलाक का मामला ऐसे बदनाम कर दिया गया जैसे हर कोई बड़ी आसानी से तलाक ले लेता है। वहां मेहर की रकम तय होती है और जो तलाक लेता है उसे मेहर की रकम अदा करनी होती है। अपने यहां तो भरपूर दहेज लिया जाता है और किसी बहाने छोड़ दिया जाता है। हत्या कर दिए जाने के भी मामले हैं। लेकिन इस बुराई की चिन्ता उतनी नहीं है जितनी तीन तलाक या एक से ज्यादा विवाह करने की कथित धार्मिक आजादी को है।

अव्वल तो हमारे यहां यह आजादी नहीं है तो भी कई लोग बगैर घोषणा एक से ज्यादा शादी करते हैं। दूसरी ओर, अगर आजादी है तो व्यावहारिक कहां है। ऐसे में मामला धर्म विशेष का नहीं व्यक्ति विशेष का है। लेकिन एक धर्म की बुराइयों को छोड़कर दूसरे धर्म की अच्छाइयों को भी बुरा कहा जा रहा है। उदाहरण के लिए, बच्चा न हो या बेटा न हो तो हमारे यहां दूसरी शादी के मामले सुनने में आते हैं। उसे कोई बुरा भी नहीं कहता। सामाजिक तौर पर तो मनाही नहीं ही है। इसलिए लोग छिप कर करते हैं। अगर एक से ज्यादा विवाह की इजाजत होती तो छिपने की जरूरत नहीं होती। इस लिहाज से यह अच्छाई है भले बहु-विवाह गलत, अनुचित या गैर कानूनी हो। ऐसे में मुद्दा धार्मिक इजाजत से ज्यादा व्यक्ति के व्यवहार का है लेकिन उसकी चिन्ता नहीं की जा रही है।

दूसरी शादी के लिए धर्म बदलने के उदाहरण भी हैं। चंद्रमोहन से चांद मोहन और फिर अनुराधा को फिजा बनाने और तलाक देने तथा पुरानी पत्नी के पास वापस चले आने का भी एक मामला है। कई हिन्दुओं ने एक से ज्यादा शादी की है। हालांकि, पहली को विधिवत छोड़कर दूसरी से शादी की जाए तो वह नैतिक रूप से बहुत बुरा नहीं है पर एक को छोड़े बगैर दूसरी से शादी कर लेना या एक को छोड़कर दूसरी के साथ बिना शादी किए रहना ज्यादा बुरा है। पर सब होता है। बड़े लोगों ने किया है। दुनिया जानती है कि विवाहित और बाल बच्चेदार धर्मेन्द्र ने हेमा मालिनी से शादी करने के लिए 21 अगस्त 1979 को इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था।

दूसरी ओर, सुनील दत्त नर्गिस के साथ रहे और शाहरुख खान गौरी के साथ रह रहे हैं लेकिन बात करेंगे आमीर खान की। उस आफताब की नहीं जिससे पीड़ित जसोदाबेन के पास विवाह का प्रमाणपत्र नहीं है और इसलिए उनका पासपोर्ट नहीं बन रहा था। जसोदाबेन के आफताब से किसी ने नहीं कहा कि उनका पासपोर्ट तो बन जाने दो। ऐसी श्रद्धाओं का पासपोर्ट कैसे बने उसकी व्यवस्था भी हो – इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। लोग सीख ऐसे दे रहे हैं जैसे टुकड़ों में काटने का काम सिर्फ आफताब ही करते हैं। बाकी सब दूध के धुले हैं। सच्चाई यह है कि एक का पासपोर्ट मत बनने दो दूसरी लापता हो जाए तो कह दो विदेश चली गई। यह तय करने की कोशिश भी नहीं हुई कि उसे 72 टुकड़े तो नहीं कर दिए गए। तंदूर में जला तो नहीं दिया गया।

वैसे तो प्रेम में पड़ी महिला की हत्या का मामला कोई नया नहीं है पर धर्म जिहाद जरूर नया है और उसका प्रचार तो सब जानते हैं कब शुरू हुआ। दूसरी ओर, भोपाल के विभा मिश्रा और बव कारंत मामले में (1987) तो सरकार ने सरकारी वकील को भी नाटकीय ढंग से बदल दिया था। और राज्य सरकार ने पांच बार वकील बदले थे। इंडिया टुडे की खबर के अनुसार इससे पता चलता है कि मामले में सरकार भी निर्णय लेने में अक्षम थी। द हिन्दू की एक खबर के अनुसार इंडियन एक्सप्रेस के उस समय के भोपाल संवाददाता ने कहा था कि उनपर हर एंगल से खबर देने का दबाव रहता था ताकि उसे प्रमुखता से छापा जा सके। जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि रंगकर्मी बव कारंत की शिष्या विभा मिश्रा ने आत्महत्या की कोशिश की थी और उसे बचाने में कारंत भी घायल हो गए थे।

श्रद्धा और आफाताब मामले में परेशान लोगों को हाल के उत्तराखंड मामले की जांच की भी चिन्ता नहीं है जहां पुलकित आर्या ने अपने होटल की रिसेप्शनिस्ट की हत्या कर दी थी। यह किसी वीआईपी की सेवा का मामला था और कई बड़े लोग शामिल होंगे। बिहार में एक श्वेतनिशा त्रिवेदी की हत्या हुई थी (1983)। वह बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेस नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी। उसकी खूबसूरती को देखकर उसके प्रशंसकों ने उसका नाम राजकपूर की फिल्म बॉबी की नायिका का दे दिया था। कई माननीय उस पर इस कदर लट्टू थे कि अपने भत्ते का पूरा बिल बना उसे सौंप दिया करते थे। उसकी खूबसूरती की वजह से कई राजनेताओं के साथ उसकी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी। हत्या या मौत के मामले में कई नेताओं के नाम आए थे पर मामला नहीं सुलझ पाया। यह तो कांग्रेस नेता की गोद ली हुई बेटी का हाल था पर अब बलात्कारियों को बचाने के कई मामले सामने आए हैं।

एक मामला तो कठुआ का ही है। 2018 का यह मामला याद हो तो जानते होंगे कि पुलिस को जांच करने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। अब तय हुआ है कि आरोपियों में एक, शुभम सांगरा को अवयस्क कहकर उसकी पहचान की रक्षा की गई थी पर वह वयस्क था। बता दें कि वह सभी अभियुक्तों में सबसे क्रूर और बर्बर भी था। यह मुख्य अभियुक्त और पुजारी संजी राम का रिश्तेदार है जिसे दो अन्य, दीपक खजूरिया और प्रवेश कुमार के साथ उम्र कैद हो चुकी है। तीन अन्य – तिलक राज आनंद, आनंद दत्ता और सुरेन्द्र वर्मा को सबूत नष्ट करने के लिए पांच साल की कैद हुई थी। जब बात चली है तो उन मामलों को भी याद कर लीजिए जो लव जेहाद नहीं हैं और महिला की हत्या से संबंधित हैं और सब उन लोगों ने किए हैं जिन्हें संस्कारी कहा जाता है या साबित करने का अभियान चल रहा है –

1.नैना साहनी का पति सुशील दिल्ली में पत्नी के शव के टुकड़े जलाते पकड़ा गया था। (1995)
2. आईपीएस के बेटे संतोष ने प्रियदर्शिनी मट्टू की पीछे पड़कर हत्या कर दी थी। (1996)
3. बार में शराब परोसने से मना करने पर मनु शर्मा ने जेसिका लाल की हत्या कर दी थी। (1999)
4. नेता के बेटों विकास और विशाल ने बहन के प्रेमी नीतिश को जलाकर मार दिया था। (2002)
5. नोएडा में माता-पिता के घर में रहते आरुषि की हत्या हो गई, मामला नहीं सुलझा (2008)
6. देहरादून में इंजीनियर राजेश गुलाटी ने पत्नी अनुपमा के 72 टुकड़े कर दिए थे। (2010)
7. एकतरफा प्यार करने वाले मेजर निखिल हांडा ने शैलजा की हत्या कर दी थी। (2018)
8. इंदौर में हर्ष शर्मा ने कुत्ते की जंजीर से पत्नी अंशु का गला घोंटा। (2020)
9. पति को छोड़कर फिरोज के साथ रहने वाली प्रीति ने फिरोज का गला रेत डाला। (2022)
10. मेरठ के गांव में एक प्रस्ताव स्वीकर नहीं करने पर शिवानी को गोली मार दी। (2022)
11. बाराबंकी में लड़की की पिता ने हत्या कर दी क्योंकि वह फोन पर बात करती थी। (2022)
12. औरैया में चाचाओं ने भतीजी की हत्या कर दी, वह भी किसी से बात करती थी। (2022)

ये कुछ चर्चित मामले हैं और बहुत सारे रह गए हैं। अगर एक या कई लव जिहाद के मामले से लड़कियों को सीख लेनी चाहिए तो इन मामलों के बाद सीख क्या हो? समाज की जो हालत है उसमें लड़किया पैदा ही न हों या किसी भी उम्र में किसी भी हालत में मार दी जाएं यह बड़ी बात नहीं है। क्योंकि जसोदा बेन जैसी महिलाओं के लिए भी समाज को चिन्ता नहीं है। आफताब मामले में समाज की चिन्ता दरअसल राजनीति है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा और बलात्कारियों को बचाने के कई उदाहरणों के बीच समस्या यह है कि कोई चाहे कि वह बेटी का बाप न बने तो कानूनन वह भी संभव नहीं है।

– साभार सहित

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