राहुल की चिट्ठी और अखिलेश का PDA: क्या मायावती के किले में सेंध लगा पाएगा विपक्ष?

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की माहिर खिलाड़ी मानी जाने वाली मायावती आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन जिस तरह से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा ने बसपा संस्थापक कांशीराम के नाम पर दलित वोटबैंक को साधना शुरू किया है, उससे मायावती के ‘नीले किले’ की दीवारें दरकती नजर आ रही हैं।

राज्य की राजनीति में करीब 22 फीसदी दलित वोटबैंक बेहद अहम माना जाता है। इसी आधार पर मायावती चार बार मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन अब यही वोटबैंक कई दलों के निशाने पर है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी समेत अन्य दल कांशीराम की विरासत को साधकर अपने समीकरण मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे बसपा के सामने अस्तित्व का संकट गहराता दिख रहा है।

बीते कुछ चुनावों में बसपा का प्रदर्शन लगातार कमजोर हुआ है। पार्टी का जनाधार घटा है और कई बड़े नेता साथ छोड़ चुके हैं। मौजूदा हालात में बसपा उत्तर प्रदेश में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और मायावती सियासी तौर पर अलग-थलग पड़ती नजर आ रही हैं।

दलित वोटबैंक को लेकर विपक्ष की सक्रियता साफ दिख रही है। राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाई, तो अखिलेश यादव ने उनकी जयंती को ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाया। वहीं बीजेपी, रालोद और चंद्रशेखर आजाद भी दलित समाज को साधने में जुटे हैं। ऐसे में 2027 का चुनाव मायावती के लिए आसान नहीं दिख रहा।

शिखर से गिरावट तक: बसपा का कमजोर होता जनाधार

कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की थी और पार्टी ने कुछ ही वर्षों में सत्ता में हिस्सेदारी हासिल कर ली। 1993 में सपा के साथ गठबंधन सरकार बनी और 1995 में मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। 2007 का चुनाव बसपा के लिए ऐतिहासिक रहा, जब पार्टी ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और करीब 30 फीसदी वोट शेयर प्राप्त किया।
उस जीत के पीछे मायावती की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति थी, जिसमें दलितों के साथ अन्य वर्गों को भी जोड़ा गया।

हालांकि इसके बाद से बसपा का ग्राफ लगातार गिरता गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और वोट शेयर घटकर करीब 13 फीसदी रह गया।

आज स्थिति यह है कि यूपी विधानसभा में बसपा के पास सिर्फ एक विधायक है और 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। इससे साफ है कि पार्टी का संगठन और जनाधार दोनों कमजोर हो रहे हैं।

नई चुनौतियां, पुराना वोटबैंक भी खिसका

बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक वोटबैंक को बचाए रखने की है। जाटव समाज पर मायावती की पकड़ पहले जैसी नहीं रही और चंद्रशेखर आजाद के रूप में एक नया चेहरा उभरकर सामने आया है। वहीं गैर-जाटव दलित पहले ही बसपा से दूरी बना चुके हैं।

मुस्लिम वोटबैंक भी बसपा से दूर होता नजर आ रहा है, जिसका एक बड़ा कारण विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोप हैं कि बसपा बीजेपी की ‘बी-टीम’ है। हाल के चुनावी नतीजे भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं।

2027 की चुनौती: क्या मायावती कर पाएंगी वापसी?

कांशीराम की विरासत को लेकर जिस तरह सभी दल सक्रिय हैं, उसने मायावती के लिए राजनीतिक चुनौती और बढ़ा दी है। दलित समाज भी अब नए विकल्पों की ओर देख रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती 2027 के चुनाव से पहले अपने पारंपरिक वोटबैंक को फिर से एकजुट कर पाएंगी?

फिलहाल, सियासी हालात यही संकेत दे रहे हैं कि बसपा के लिए आगे की राह आसान नहीं है और मायावती को अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करने के लिए नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना होगा।