रायबरेली से अवध तक राहुल गांधी की सियासी बिसात: ‘वीरा पासी’ के बहाने दलित वोटबैंक पर बड़ा दांव

Politics

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी तपिश अभी से महसूस होने लगी है। इसी चुनावी बिसात के बीच, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चार महीने के लंबे अंतराल के बाद अपने दो दिवसीय दौरे पर संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुंचे। इस दौरे के दौरान राहुल गांधी ने न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका, बल्कि लोधवारी गांव में 1857 की क्रांति के महानायक वीरा पासी की भव्य प्रतिमा का अनावरण कर अवध से लेकर पूर्वांचल तक एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया।

​भावुक संवाद से लेकर क्रांतिकारी इतिहास तक का सफर

​उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनावी समर की सुगबुगाहट और बढ़ती सियासी तपिश के बीच राहुल गांधी का यह दौरा बेहद रणनीतिक रहा। दौरे के पहले दिन राहुल गांधी पूरी तरह एक्शन मोड में दिखे और उन्होंने ताबड़तोड़ तीन जनसभाओं को संबोधित किया। इस दौरान आयोजित ‘महिला संवाद’ कार्यक्रम में उन्होंने रायबरेली की जनता के साथ गांधी परिवार के दशकों पुराने और आत्मीय रिश्तों को एक बार फिर ताजा किया।

दौरे के दूसरे दिन उन्होंने स्थानीय गेस्ट हाउस में न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका, बल्कि क्षेत्र की आम जनता से सीधे रूबरू होकर उनकी जनसमस्याएं भी सुनीं। इसके तुरंत बाद राहुल गांधी लोधवारी गांव पहुंचे, जहां उन्होंने 1857 के महान क्रांतिकारी महाबली वीरा पासी की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। इस अनावरण के पीछे राहुल गांधी की मंशा साफ थी वीरा पासी के गौरवशाली इतिहास के जरिए सामाजिक न्याय के अपने एजेंडे को और धार देना तथा रायबरेली से लेकर पूरे अवध क्षेत्र के सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ना।

​संविधान, आंबेडकर और वीरा पासी के खून का रिश्ता

​लोधवारी गांव में आयोजित इस भव्य अनावरण कार्यक्रम की रूपरेखा कांग्रेस नेता और राही ब्लॉक प्रमुख धर्मेंद्र बहादुर सिंह उर्फ राजू यादव द्वारा तैयार की गई थी, जिन्होंने इस प्रतिमा की स्थापना कराई थी। इस मौके पर जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने रायबरेली की माटी के प्रतीक और महान योद्धा वीरा पासी के शौर्य को नमन किया।

राहुल गांधी ने वैचारिक हमला बोलते हुए कहा, “आज हम वीरा पासी को याद कर रहे हैं, लेकिन मैं सोच रहा था कि बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की जिस विचारधारा ने देश को दिशा दी, आज उसे खत्म करने की साजिश रची जा रही है। आप लोग पास में रखी संविधान की किताब को कोई मामूली किताब मत समझिए, यह एक साक्षात विचारधारा है जो बाबा साहब आंबेडकर, महात्मा गांधी और महाबली वीरा पासी के खून में दौड़ती थी। आजादी के बाद लिखी गई इस पावन किताब के पीछे उन तमाम नायकों का संघर्ष है जो इसके लिए लड़े और शहीद हुए। गुरु नानक, संत कबीर और भगवान बुद्ध जैसे महापुरुषों की सामूहिक आवाज इस संविधान में बसती है।”

​आरएसएस और भाजपा पर तीखा हमला

​राहुल गांधी ने मंच से पासी समाज और दलितों को सचेत करते हुए सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा, “अगर हम वीरा पासी और बाबा साहब आंबेडकर के सामने श्रद्धा से हाथ जोड़ते हैं, तो यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम उनकी विचारधारा का सम्मान भी करें। अगर आज आंबेडकर साहब खुद यहाँ आपके बीच बैठे होते और आप लोग उनके सामने तो नारे लगाते, लेकिन बाहर जाकर अंग्रेजों से हाथ मिला लेते, तो यह उनकी विचारधारा पर सबसे बड़ा आघात होता। आज विडंबना यह है कि हम तस्वीरों के सामने तो सिर झुका लेते हैं, लेकिन जब वीरा पासी और आंबेडकर की सोच का अपमान होता है, तो चुप्पी साध लेते हैं। आपके सामने आरएसएस के लोग संविधान की मूल भावना को फाड़कर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं और आप मौन हैं। यह संविधान महज कागज का टुकड़ा नहीं बल्कि आपका मान-सम्मान और आपका खून है, जिसकी रक्षा करना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है।” राहुल ने जोर देकर कहा कि वीरा पासी और आंबेडकर जी का मानना था कि हिंदुस्तान का हर नागरिक बराबर है, सबको समान अधिकार और मेहनत का सही फल मिलना चाहिए। यह देश किसी एक जाति या संगठन की जागीर नहीं, बल्कि हर एक देशवासी का है।

​वीरा पासी का शौर्य और रायबरेली का सबसे बड़ा वोटबैंक

अगर इतिहास के पन्नों को पलटें, तो वीरा पासी सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा राणा बेनी माधव के सबसे भरोसेमंद सेनापति थे। जब ब्रिटिश हुकूमत ने राजा राणा बेनी माधव को बंदी बनाकर रायबरेली की जेल में डाल दिया था, तब वीरा पासी ने अपनी बहादुरी के दम पर जेल की दीवारें तोड़कर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला था। उनके इसी अदम्य साहस, शौर्य और स्वाभिमान पर आज पूरा पासी समाज गर्व करता है। रायबरेली ही नहीं, बल्कि पूरे अवध क्षेत्र में पासी समुदाय उन्हें अपना मसीहा और आदर्श मानता है।

​इसी सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलता को भांपते हुए राहुल गांधी ने वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण कर दलित समुदाय, विशेषकर पासी समाज का दिल जीतने का बड़ा कार्ड खेला है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो रायबरेली जिले में पासी समुदाय सबसे बड़ा निर्णायक वोटबैंक है, जिनकी संख्या करीब 5 लाख से भी अधिक है। जिले की सभी विधानसभा सीटों पर हार-जीत का फैसला इन्हीं के हाथ में होता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को मिली प्रचंड जीत में भी इस वर्ग ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी वफादारी का इनाम देने और इस जुड़ाव को स्थायी बनाने के लिए राहुल गांधी ने इस समाज के युवा चेहरे सुशील पासी को आगे बढ़ाया है, जो कार्यक्रम के दौरान मंच पर राहुल गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखे।

​रायबरेली के रास्ते पूरे अवध को साधने की ‘जुगलबंदी’

उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी दलित राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें पासी समुदाय भले ही शांत रहता हो, लेकिन चुनावी नतीजों को पलटने की अपार ताकत रखता है। सूबे में कुल अनुसूचित जाति (दलित) की आबादी लगभग 21 फीसदी है। इसमें करीब 54 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ जाटव समाज पहले नंबर पर है, जबकि इसके ठीक बाद दूसरे नंबर पर पासी समाज आता है, जो कुल दलित आबादी का करीब 16 फीसदी है। यह राज्य की कुल आबादी का 3.2 प्रतिशत से ज्यादा बैठता है।

अवध और पूर्वांचल के मैदानों में पासी मतदाताओं का प्रभाव सबसे ज्यादा है। रायबरेली, अमेठी, लखनऊ, बाराबंकी, हरदोई, उन्नाव, सीतापुर, कौशंबी, प्रयागराज और प्रतापगढ़ जैसे तकरीबन एक दर्जन से अधिक जिलों में यह समाज चुनावी बिसात का राजा माना जाता है।

सूबे की लगभग 65 से 70 विधानसभा सीटों और 12 से 15 लोकसभा सीटों पर यह मतदाता सीधे तौर पर गेमचेंजर की भूमिका में हैं।

​वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद कर पासी समाज को अपने पाले में करने के लिए बड़ी घेराबंदी की है। हाल ही में अखिलेश यादव ने गोमती रिवर फ्रंट पर महाराजा बिजली पासी की सोने की प्रतिमा लगाने का बड़ा एलान किया था। अब ठीक उसी के जवाब में राहुल गांधी ने रायबरेली की धरती से वीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण कर साफ कर दिया है कि कांग्रेस अपने इस मजबूत आधार को खिसकने नहीं देगी। 2027 के चुनावी दंगल से पहले पासी समाज के स्वाभिमान को लेकर शुरू हुई यह ‘मूर्तियों की सियासत’ आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक ऊंट की करवट तय करने वाली साबित होगी।