आगरा: शहर के फेफड़े कहे जाने वाले ऐतिहासिक पालीवाल पार्क में इन दिनों भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का ‘नंगा नाच’ चल रहा है। उद्यान विकास समिति द्वारा निर्धारित 10 रुपये की एंट्री फीस को ठेंगे पर रखकर ठेकेदार सरेआम 20 रुपये वसूल रहा है। हद तो तब हो गई जब बिना किसी आधिकारिक टेंडर के पार्किंग के नाम पर भी 20 रुपये की अतिरिक्त अवैध वसूली शुरू कर दी गई। इस ‘डबल लूट’ से सुबह-शाम पार्क आने वाले ताजनगरी के नागरिकों में भारी आक्रोश है।
अधिकारियों के संरक्षण में फल-फूल रहा खेल?
हैरानी की बात यह है कि उद्यान विकास समिति की बैठक में शुल्क 10 रुपये ही तय किया गया था। बीच में जब विरोध हुआ, तो ठेकेदार ने कागजों का हवाला देकर इसे सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन पोल खुलने पर वापस 10 रुपये कर दिया। अब एक बार फिर दबंगई के बल पर 20 रुपये की वसूली की जा रही है।
पूर्व समिति सदस्य प्रदीप खंडेलवाल ने राजकीय उद्यान अधीक्षक को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि यह सब अधिकारियों की ‘मिलीभगत’ के बिना संभव नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पार्क इंस्पेक्टर को इसकी जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
“इस्तीफा दें समिति सदस्य या वसूली रुकवाएं”
प्रदीप खंडेलवाल ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उद्यान विकास समिति के सदस्य केवल अधिकारियों की ‘चमचागिरी’ में व्यस्त हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ठेकेदार के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज नहीं की गई और अवैध वसूली नहीं रुकी, तो वे जनता के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठेंगे। उन्होंने मांग की है कि जो सदस्य जनता के हितों की रक्षा नहीं कर सकते, उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए।
उद्यान अधीक्षक का दावा: “कल करेंगे कठोर कार्रवाई”
मामला गरमाने के बाद राजकीय उद्यान अधीक्षक रजनीश पांडे ने स्वीकार किया है कि 10 रुपये के टिकट के बदले 20 रुपये और अवैध पार्किंग शुल्क वसूला जा रहा है। उन्होंने कहा, “टेंडर में पार्किंग शुल्क का कोई प्रावधान नहीं है, यह पूरी तरह अवैध है। हम कल ही ठेकेदार पर भारी जुर्माना (Fine) लगाएंगे। यदि सुधार नहीं हुआ, तो 9 अप्रैल को समाप्त हो रहे इस ठेके को निरस्त कर ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।”
जनता के सवाल: कब रुकेगी यह मनमानी?
पार्क में टहलने आने वाले बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि ठेकेदार के कारिंदे रसीद मांगने पर बदतमीजी करते हैं। 10 रुपये की रसीद देकर 20 रुपये मांगना अब यहाँ की नियति बन गई है। अब देखना होगा कि उद्यान अधीक्षक का ‘कल’ कब आता है और क्या वाकई इस लूट तंत्र पर ताला लगता है या यह केवल आश्वासन बनकर रह जाएगा।

