कंगना रनौत केस: “क्या 1947 की आजादी भीख थी?” 3 घंटे चली तीखी बहस, कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला; 16 अप्रैल को आएगा निर्णय

Regional

आगरा: हिमाचल प्रदेश के मंडी से भाजपा सांसद और फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के खिलाफ चल रहे ‘किसान अपमान एवं राजद्रोह’ मामले में आज एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट (अनुज कुमार सिंह की अदालत) में गहमागहमी रही। करीब तीन घंटे तक चली लंबी बहस के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो अब 16 अप्रैल 2026 को सुनाया जाएगा।

वादी पक्ष का तर्क: किसानों की शहादत का अपमान और ‘भीख में मिली आजादी’ पर सवाल

वादी पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा और उनके सहयोगियों ने कोर्ट में कंगना के बयानों को देश के करोड़ों किसानों की भावनाओं को आहत करने वाला बताया।

वादी पक्ष की दलील थी कि ​कंगना ने 26 अगस्त 2024 को किसान आंदोलन के दौरान हत्या और बलात्कार होने जैसे संगीन और अमर्यादित आरोप लगाए थे।

अभिनेत्री ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था कि 1947 में मिली आजादी ‘भीख’ थी और असली आजादी 2014 में मिली है।

वकीलों ने सवाल उठाया कि क्या 15 महीने तक ठंड, गर्मी और बरसात में धरने पर बैठे 750 किसानों की मौत को ‘हत्या’ या ‘बलात्कार’ के नैरेटिव से जोड़ना सही है? क्या कोर्ट यह मानता है कि 2014 तक देश गुलाम था? इस पर अदालत ने भी अपनी असहमति व्यक्त की।

कंगना का पक्ष: टीवी इंटरव्यू और खालिस्तानी नारों का हवाला

​कंगना की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अनुसूया चौधरी ने दलील दी कि बीबीसी और एबीपी न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थानों के इंटरव्यू में धरना स्थल पर खालिस्तानी नारे और हिंसा की बातें दिखाई गई थीं। उन्होंने एक व्यक्ति की हत्या और बंगाल की युवती के साथ हुए कथित बलात्कार के मामले का जिक्र कर कंगना के बयानों को जायज ठहराने की कोशिश की।

पलटवार: ‘भीड़ में जेबकतरे आने से मेला बदनाम नहीं होता’

​जवाब में वादी पक्ष ने कहा कि किसान आंदोलन केवल तीन काले कानूनों के विरोध में था। अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने तंज कसते हुए कहा कि यदि किसी भीड़ या मेले में दो-चार जेबकतरे आ जाएं, तो उससे पूरे मेले की गरिमा खत्म नहीं होती। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन घटनाओं का जिक्र कंगना की टीम कर रही है, उनमें किसी भी किसान का नाम एफआईआर में नहीं था और वे घटनाएं धरना स्थल से बाहर की थीं।

जुर्माना अदा और अगली तारीख

कोर्ट के पिछले आदेश का पालन करते हुए कंगना की अधिवक्ता ने ₹500 का जुर्माना वादी पक्ष को अदा किया। बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजवीर सिंह ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग से संबंधित कानूनी एक्ट भी कोर्ट के समक्ष रखे। अब सबकी निगाहें 16 अप्रैल पर टिकी हैं, जब अदालत इस हाई-प्रोफाइल मामले में अपना फैसला सुनाएगी।