नई दिल्ली/जयपुर/मुंबई: मिडिल-ईस्ट (Middle East) में छिड़े युद्ध की तपिश अब भारतीय रसोई और उद्योगों तक पहुँच गई है। एलपीजी (LPG) के गहरे संकट ने देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी की थाली तक को हिलाकर रख दिया है। कमर्शियल गैस की किल्लत के कारण कपड़ा, मार्बल और केमिकल फैक्ट्रियों पर ताले लटक गए हैं, जिससे हजारों मजदूर एक बार फिर ‘कोरोना काल’ जैसी बेबसी का सामना कर रहे हैं और भारी मन से अपने गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं।
सूरत से मुंबई तक हाहाकार, ब्लैक में बिक रहे सिलेंडर
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और टेक्सटाइल हब सूरत में हालात बेकाबू हैं। मुंबई में लोग राशन के लिए नहीं, बल्कि एक सिलेंडर के लिए मीलों लंबी कतारों में खड़े हैं।
कालाबाजारी इस कदर हावी है कि 900-1000 रुपये वाला सिलेंडर 2500 से 3000 रुपये में बिक रहा है। सूरत में भी घरेलू गैस की भारी कमी के कारण प्रवासियों का धैर्य जवाब दे गया है। मजदूर अपना बोरिया-बिस्तर, चूल्हा और बर्तन समेटकर ट्रेनों में ठुंसने को मजबूर हैं। उनका साफ कहना है “जब खाना बनाना ही मुहाल हो गया, तो शहर में रहकर क्या करेंगे?”
राजस्थान के उद्योगों में सन्नाटा, फैक्ट्रियों पर जड़े ताले
राजस्थान में एलपीजी सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। जयपुर, अजमेर और किशनगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों में सन्नाटा पसरा है। कमर्शियल एलपीजी न मिलने से सेरामिक, मार्बल और कपड़े की हजारों इकाइयां बंद हो गई हैं। जयपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 1 और 3 पर युद्ध जैसे हालात हैं।
अजमेर-सियालदह और गरीब नवाज एक्सप्रेस में चढ़ने के लिए बिहार, यूपी और बंगाल जाने वाले मजदूरों के बीच मारामारी मची है। रींगस की बोरोसिल फैक्ट्री और सीतापुरा की केमिकल फैक्ट्रियों के बंद होने से बेरोजगार हुए मजदूरों ने कहा कि मालिक ने हिसाब कर दिया है, अब गांव में रहकर लकड़ियों पर खाना बनाएंगे, पर यहां भूखे नहीं मरेंगे।
सरकारी हेल्पलाइन फेल, दावों और हकीकत में बड़ा अंतर
एक तरफ सरकार राहत के दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बगरू इंडस्ट्री एसोसिएशन के महासचिव नवनीत झालानी ने बताया कि सरकारी हेल्पलाइन (14435) पर कोई ठोस जानकारी नहीं मिल रही है। अधिकारियों को नए सरकारी आदेशों तक की जानकारी नहीं है। हेल्पलाइन पर तैनात कर्मचारी मदद के बजाय अनभिज्ञता जता रहे हैं, जिससे इंडस्ट्री मालिकों और मजदूरों में भारी आक्रोश है।
”भूखे मरने से अच्छा है गांव लौट जाएं…”
लोकमान्य तिलक टर्मिनस (LTT) पर खड़े प्रवासियों की आंखों में भविष्य को लेकर डर साफ दिख रहा है। मजदूरों का कहना है कि बाहर का खाना इतना महंगा है कि पूरी दिहाड़ी पेट भरने में ही निकल जाती है। उनके मुताबिक, “गांव में कम से कम जलावन और खेत-खलिहान तो हैं, वहां चूल्हा तो जलेगा।”
जनता की सरकार से एक ही मांग है कि युद्ध दुनिया के किसी भी कोने में हो, भारत के गरीब का चूल्हा नहीं बुझना चाहिए। अगर समय रहते कालाबाजारी नहीं रुकी और आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो यह संकट मानवीय त्रासदी का रूप ले सकता है।

