ग्लोबल जंग की आंच में भारत की ‘एनर्जी लाइफलाइन’: होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की बारूदी घेराबंदी, कतर से गैस सप्लाई पर संकट

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​नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य संघर्ष अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बन गया है। फारस की खाड़ी में बढ़ते हमलों के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आ रहे एक मालवाहक जहाज के क्षतिग्रस्त होने की खबर ने वैश्विक सप्लाई चेन में हड़कंप मचा दिया है।

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में ईरान द्वारा बिछाई जा रही बारूदी सुरंगों ने भारत की तेल और गैस आपूर्ति लाइन को सीधे निशाने पर ले लिया है।

​क्यों बढ़ा भारत का सिरदर्द?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर है। आँकड़ों के अनुसार, भारत का 50% तेल और 60% से अधिक एलएनजी (LNG) व एलपीजी (LPG) इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर आता है। कतर, जो भारत को कुल एलएनजी का 50% हिस्सा अकेले सप्लाई करता है, वहां की ‘रास लफ्फान’ फैसिलिटी पर हुए ड्रोन हमले के बाद उत्पादन रुकने से भारत की एक-तिहाई गैस सप्लाई पहले ही बाधित हो चुकी है।

वैकल्पिक रास्तों पर भी संकट के बादल

​होर्मुज के अलावा भारत के पास लाल सागर और स्वेज नहर का विकल्प बचता है, लेकिन वहां ‘बॉब अल मांदेब’ क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों ने शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम को आसमान पर पहुँचा दिया है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया से होने वाली सप्लाई सुरक्षित है क्योंकि वह होर्मुज के रास्ते का उपयोग नहीं करती, लेकिन भारत की 90% एलपीजी आपूर्ति सऊदी अरब, यूएई और कतर से होती है, जो वर्तमान में ‘वॉर ज़ोन’ के करीब हैं।

​भारत का ‘प्लान-बी’: अमेरिका और नॉर्वे पर टिकी निगाहें

सप्लाई चेन टूटने के डर से भारत ने अब नए सुरक्षित रास्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं।

यूनाइटेड स्टेट्स गल्फ कोस्ट: साल 2026 के लिए भारतीय तेल कंपनियों (IOC, BPCL, HPCL) ने अमेरिका के गल्फ कोस्ट से 22 लाख टन एलपीजी के लिए करार किया है।

​नए भागीदार: खाड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए भारत अब नॉर्वे और अमेरिका से गैस आयात बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

​होर्मुज की खाड़ी से दुनिया का 20% ऊर्जा व्यापार होता है। यदि ईरान यहां पूरी तरह पाबंदी लगाता है, तो न केवल भारत बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं।