आगरा: ताजनगरी के बेसिक शिक्षा विभाग में सोमवार को उस समय मर्यादाएं तार-तार हो गईं, जब 13 वर्षों से नियुक्ति की आस लगाए बैठे गणित और विज्ञान शिक्षकों के भविष्य के साथ ‘रिश्वतखोरी’ का खेल खेलने का आरोप लगा। सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद खुशियों की उम्मीद लगाए अभ्यर्थियों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब विभाग के एक बाबू ने कथित तौर पर नियुक्ति पत्र के बदले एक-एक लाख रुपये की मांग कर डाली।
13 साल का वनवास और फिर ‘वसूली’ का साया
मामला वर्ष 2013 की गणित-विज्ञान शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर करीब 30 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र मिलने थे। सोमवार को जब प्रक्रिया शुरू हुई, तो अचानक 10 अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्र रोक दिए गए। आरोप है कि विभाग में तैनात योगेंद्र नामक बाबू इन अभ्यर्थियों को फोन कर अलग से मिलने के लिए बुलाता था और नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये का दबाव बनाता था।
BSA कार्यालय का घेराव और दो घंटे का तांडव
जैसे ही अभ्यर्थियों को इस ‘डील’ की भनक लगी, उनका धैर्य जवाब दे गया। आक्रोशित अभ्यर्थियों ने बीएसए (BSA) कार्यालय का मुख्य गेट बंद कर दिया और वहीं धरने पर बैठ गए। कार्यालय परिसर ‘भ्रष्टाचार बंद करो’ के नारों से गूंज उठा। अभ्यर्थियों का साफ कहना था कि 13 साल के मानसिक और आर्थिक शोषण के बाद अब वे एक रुपया भी रिश्वत नहीं देंगे।
दबाव में झुका प्रशासन, जारी हुए पत्र
करीब दो घंटे तक चले भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच विभागीय अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। मामला बिगड़ता देख और मीडिया की सुगबुगाहट पाकर आनन-फानन में अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया। अभ्यर्थियों के कड़े रुख के आगे विभाग को झुकना पड़ा और रोके गए सभी 10 नियुक्ति पत्र तत्काल प्रभाव से जारी कर दिए गए। पत्र हाथ में आने के बाद ही अभ्यर्थियों ने अपना धरना समाप्त किया।
कार्यशैली पर गंभीर सवाल
भले ही नियुक्ति पत्र जारी हो गए हों, लेकिन इस घटना ने बेसिक शिक्षा विभाग की पारदर्शिता पर बड़ा कलंक लगा दिया है। सवाल यह उठता है कि:
अगर अभ्यर्थी पात्र थे, तो उनके पत्र पहले क्यों रोके गए?
क्या विभाग के उच्च अधिकारियों को इस कथित ‘वसूली’ की जानकारी थी?
क्या आरोपी बाबू के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी?
यह प्रकरण साफ करता है कि सरकारी तंत्र में आज भी एक अभ्यर्थी को अपनी जायज नौकरी पाने के लिए अदालतों के साथ-साथ दफ्तरों के भ्रष्टाचार से भी दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं।

