संसद में ‘असाधारण’ संग्राम: स्पीकर ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर तीखी बहस, गौरव गोगोई बोले- ‘यह निजी दुश्मनी नहीं, मर्यादा की लड़ाई’

National

नई दिल्ली, 10 मार्च 2026: भारतीय संसदीय इतिहास में मंगलवार का दिन एक दुर्लभ और असाधारण घटनाक्रम का गवाह बना। लोकसभा में विपक्षी दलों द्वारा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह केवल तीसरी बार है जब सदन के अध्यक्ष के खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया है। इससे पहले 1954 में जी.वी. मावलंकर और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए थे।

​”मर्यादा बचाने के लिए उठाया कदम”

बहस की कमान संभालते हुए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने स्पष्ट किया कि विपक्ष की मंशा व्यक्तिगत हमला करना नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें दुख है कि ओम बिरला जैसे व्यक्ति के खिलाफ हमें यह प्रस्ताव लाना पड़ा, जिनसे हमारे अच्छे संबंध हैं। लेकिन संसद की गरिमा और मर्यादा की रक्षा करना हमारा धर्म है। जब विपक्ष के नेता को बोलने से रोका जाए और सदन एकतरफा चले, तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचता।”

​विपक्ष के 4 मुख्य आरोप

कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने स्पीकर पर चार गंभीर आरोप लगाए हैं:

​राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता को भाषण पूरा करने से रोकना।

​कांग्रेस के 8 सांसदों को नियम विरुद्ध निलंबित करना।

भाजपा सांसदों को पूर्व प्रधानमंत्रियों (नेहरू और इंदिरा गांधी) पर आपत्तिजनक टिप्पणी की अनुमति देना।

विपक्षी सांसदों पर प्रधानमंत्री पर हमले की योजना बनाने का निराधार आरोप लगाना।

​डिप्टी स्पीकर के पद पर ‘संवैधानिक शून्य’

बहस के दौरान डिप्टी स्पीकर (उपसभापति) का पद खाली होने का मुद्दा भी गरमाया। कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने सरकार को घेरते हुए कहा कि 2019 से यह पद खाली रखकर सरकार ने ‘संवैधानिक शून्य’ पैदा कर दिया है।

एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अनुच्छेद 95 का हवाला देते हुए जगदंबिका पाल की अध्यक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि जब डिप्टी स्पीकर का पद खाली हो, तो अध्यक्षता के लिए सदन की राय लेना अनिवार्य है।

​सेना और संस्मरणों पर छिड़ी रार

​गौरव गोगोई ने बजट सत्र के दौरान उठाए गए उन मुद्दों का भी जिक्र किया जिन्हें सदन के रिकॉर्ड से हटा दिया गया था या बोलने नहीं दिया गया था। उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के संस्मरणों और कुछ उद्योग समूहों के खिलाफ जांच का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सदन में विपक्ष की आवाज को गृह मंत्री और रक्षा मंत्री के साथ मिलकर दबाया गया। हालांकि, पीठासीन अधिकारी जगदंबिका पाल ने इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इन पर स्पीकर पहले ही फैसला दे चुके हैं।

​आगे क्या?

हंगामे और तीखी बयानबाजी के बीच जगदंबिका पाल ने प्रस्ताव को मतदान के लिए रख दिया। 50 से अधिक सांसदों के समर्थन के साथ इस प्रस्ताव पर औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है। दिलचस्प बात यह रही कि जब यह ऐतिहासिक चर्चा चल रही थी, तब विपक्ष के नेता राहुल गांधी सदन में मौजूद नहीं थे।