मुंबई (अनिल बेदाग)। सिनेमा की खुशबू, आत्मीय रिश्तों की गर्माहट और स्मृतियों की मुलायम परतों से सजी एक खास दोपहर उस समय जीवंत हो उठी, जब प्रख्यात अभिनेत्री व सांसद हेमा मालिनी ने सोसाइटी अचीवर्स मैगज़ीन के नवीनतम अंक का अनावरण किया। इस विशेष संस्करण के कवर पर भारतीय सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार रमेश सिप्पी को सम्मानित किया गया, जिनकी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को कालजयी पहचान दी है।
यह आत्मीय और गरिमामय आयोजन हेमा मालिनी के सुसज्जित निवास पर हुआ, जहां भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर की यादें मानो दीवारों से झलक रही थीं। इस अवसर पर रमेश सिप्पी अपनी पत्नी, अभिनेत्री किरण जोनेजा, के साथ उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में अशोक धमणकर (संस्थापक, मैग्नेट पब्लिशिंग), एंड्रिया कोस्टाबीर (चीफ एडिटर, सोसाइटी अचीवर्स), जयश्री धमणकर, मारियो फ़ेरेइरा, रिया सचदेवा और डॉ. (मानद) अनुषा श्रीनिवासन अय्यर अपनी टीम के साथ मौजूद रहीं। अनौपचारिक माहौल में बातचीत, स्वादिष्ट जलपान और साझा यादों का सिलसिला चलता रहा।
हमेशा की तरह शालीन और स्नेहिल हेमा मालिनी ने अपने शोले के निर्देशक और वर्षों पुराने मित्र रमेश सिप्पी के साथ जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। उन्होंने उस दौर की फिल्ममेकिंग में लगने वाले कठोर परिश्रम का जिक्र करते हुए एक मार्मिक किस्सा सुनाया—कैसे गर्मियों की शूटिंग में तपते पत्थरों पर नंगे पांव नृत्य करना पड़ा।
मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, “मेरी मां ने मुझे बचाने के लिए चुपचाप चप्पलें पहनाने की कोशिश की थी, लेकिन सिप्पी साहब की पैनी नजर से कुछ भी नहीं छुप सका। कैमरे में सब दिखता है यह उनका साफ संदेश था।”
शोले को याद करते हुए हेमा मालिनी ने बताया कि शुरुआत में रमेश सिप्पी उन्हें भूमिका देने को लेकर असमंजस में थे, लेकिन उन्होंने कहानी और निर्देशक की समझ पर भरोसा किया। “मैंने कभी अपने स्थान के बारे में नहीं सोचा मेरे लिए कहानी सबसे अहम थी,” उन्होंने कहा।
रमेश सिप्पी ने उस दौर को विनम्रता से याद करते हुए कहा, “उस फिल्म में हर कलाकार विश्वास के साथ जुड़ा था। हम सब फिल्म के लिए काम कर रहे थे, अपने लिए नहीं।”
बातचीत में धर्मेंद्र का भी विशेष उल्लेख हुआ। सिप्पी ने उनके समर्पण का किस्सा साझा किया “एक बार वे शूट पर पहुंचने के लिए लगभग 50 किलोमीटर पैदल चलकर आए। बिना किसी शिकायत के उन्होंने कैमरे का सामना किया।”
इस पर हेमा मालिनी भावुक हो उठीं। उन्होंने धर्मेंद्र को “एक खूबसूरत इंसान—कभी शरारती, तो कभी बेहद संवेदनशील” बताया और शोले के ऐतिहासिक टैंक सीन को याद किया। उन्होंने संजीव कुमार को भी स्नेहपूर्वक स्मरण करते हुए कहा कि यदि वे आज होते, तो इस कवर को देखकर बेहद प्रसन्न होते।
बातचीत का रुख वर्तमान सिनेमा की ओर भी मुड़ा क्लासिक फिल्मों की एआई आधारित पुनर्कल्पनाओं और नई पीढ़ी द्वारा शोले को नए दृष्टिकोण से देखने की संभावना पर विचार हुआ। इस पर रमेश सिप्पी ने सहजता से कहा, “कुछ फिल्में अपने समय की होती हैं—उन्हें दोहराया नहीं जा सकता।”
यह अनावरण केवल एक मैगज़ीन कवर लॉन्च नहीं था, बल्कि सिनेमा, विश्वास, रचनात्मक साहस और समय से परे मित्रता का उत्सव बन गया। अशोक धमणकर के शब्दों में, “यह सिर्फ़ कवर का अनावरण नहीं, बल्कि उस जादू को सलाम था जो तब रचता है, जब महान कथाकार एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं।”

