70 सीटों पर सीधा प्रभाव: यूपी में ब्राह्मणों के ‘हिमायती’ बनने की जंग, ‘डिनर डिप्लोमेसी’ से लेकर प्रबुद्ध सम्मेलनों तक का दांव

Politics

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी बजा नहीं है, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। इस बार के ‘रण’ में सबसे बड़ा केंद्र ब्राह्मण मतदाता बने हुए हैं। प्रदेश की राजनीति में ‘ओपिनियन मेकर’ माने जाने वाले इस वर्ग को साधने के लिए भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस—सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

सियासी समीकरण: क्यों अहम है यह वर्ग?

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी 11 से 13 प्रतिशत के बीच है। जानकारों के मुताबिक, प्रदेश की 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर इस समुदाय का सीधा प्रभाव है। पूर्वांचल और अवध के जिलों में तो यह समुदाय हार-जीत की धुरी माना जाता है। यही कारण है कि 2022 के चुनाव में सभी प्रमुख दलों ने 45 से 60 के बीच ब्राह्मण उम्मीदवारों पर दांव लगाया था।

विवादों ने बढ़ाई बेचैनी: यूजीसी और शंकराचार्य प्रकरण

हाल के दिनों में यूजीसी के नियमों और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ माघ मेले में हुई घटना ने ब्राह्मण राजनीति में उबाल ला दिया है।

भाजपा का काउंटर: डैमेज कंट्रोल के लिए डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने बटुकों का सम्मान किया और उनके पांव पखारे। वहीं डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी शंकराचार्य के साथ हुई घटना को गलत बताकर समाज के गुस्से को शांत करने की कोशिश की।

सपा-कांग्रेस का हमला: अखिलेश यादव और अजय राय इस मुद्दे पर बेहद मुखर हैं। सपा जहाँ ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की रणनीति पर चल रही है, वहीं ब्राह्मण सम्मेलनों और भगवान परशुराम की मूर्तियों के जरिए यह संदेश दे रही है कि ब्राह्मण समाज सपा में सुरक्षित है।

​कांग्रेस और बसपा की ‘घर वापसी’ की कोशिश

कांग्रेस: यूपी अध्यक्ष अजय राय अपने पुराने और पारंपरिक ब्राह्मण वोटबैंक को वापस पाने के लिए जमीन पर उतर चुके हैं। हालिया प्रबुद्ध सम्मेलनों में उनकी सक्रियता और शंकराचार्य विवाद पर कड़ा रुख इसी रणनीति का हिस्सा है।

बसपा: मायावती ने 2007 के उस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फार्मूले को याद दिलाना शुरू कर दिया है, जिसने उन्हें पूर्ण बहुमत दिलाया था। बसपा प्रमुख लगातार ब्राह्मण समाज को उचित सम्मान देने की बात कर रही हैं।

डिनर डिप्लोमेसी और आंतरिक असंतोष

पिछले साल दिसंबर में भाजपा के ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी की ‘डिनर डिप्लोमेसी’ ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। इसे पार्टी के भीतर इस वर्ग के जनप्रतिनिधियों की असहजता और समाज में उपज रहे असंतोष से जोड़कर देखा गया। जनप्रतिनिधि अब अपने समाज को यह भरोसा दिलाने में जुटे हैं कि सरकार में उनका मान-सम्मान बरकरार है।

यूपी में ब्राह्मण राजनीति का प्रभाव :

कारक                            विवरण
कुल आबादी                   लगभग 11-13%
प्रभावित सीटें                  70+ विधानसभा सीटें
मुख्य क्षेत्र।                        पूर्वांचल और अवध
पसंदीदा उम्मीदवार             सभी दल औसतन 50-60 ब्राह्मणों को देते हैं टिकट

2027 की लड़ाई केवल विकास या दावों की नहीं, बल्कि ‘सामाजिक संतुलन’ की भी होगी। ब्राह्मण वोटर जिस करवट बैठेगा, लखनऊ की सत्ता का रास्ता उसी के लिए आसान होगा। फिलहाल, सभी दल ‘प्रबुद्ध’ की शरण में हैं, लेकिन ऊंट किस करवट बैठेगा, यह वक्त बताएगा।