वृन्दावन। यमुना की शांत लहरें दो दिन पहले केसी घाट पर उस वक्त काल बन गईं, जब एक नाव पलट गई। यह महज एक दैवीय आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की उस जर्जर लापरवाही का परिणाम है जिसने आस्था को मातम में बदल दिया। रविवार को सर्च ऑपरेशन के दौरान दो और श्रद्धालुओं के शव मिलने से इस त्रासदी में मरने वालों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है।
एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें वृन्दावन से मथुरा तक यमुना का कोना-कोना छान रही हैं, लेकिन तीन तीर्थयात्री अब भी लापता हैं, जिनका सुराग मिलना अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
रविवार को बरामद हुए शवों में लुधियाना के ऋषभ शर्मा और डिंकी बंसल के रूप में शिनाख्त हुई है। यह मंजर कितना भयावह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डिंकी बंसल की माँ मीनू बंसल का शव पहले ही निकाला जा चुका था। पूरा परिवार यमुना के आगोश में समा गया, लेकिन पीछे छोड़ गया वह सिस्टम जिसे शायद अब भी अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं है।
रेस्क्यू ऑपरेशन को गति देने के लिए हरनौल और जानी एस्केप से पानी रोककर जलस्तर घटाया गया है, ताकि लापता लोगों को तलाशा जा सके।
हादसे के बाद प्रशासन की ‘जागृति’ भी किसी उपहास से कम नहीं लगती। आनन-फानन में नाविकों को 419 लाइफ जैकेट बांटी जा रही हैं। सवाल उठता है कि क्या ये जैकेट हादसे से पहले नहीं बांटी जा सकती थीं? क्या प्रशासन को यह नहीं दिख रहा था कि केसी घाट पर क्षमता से अधिक लोग नावों में भरे जा रहे हैं? बिना लाइफ जैकेट और बिना किसी सुरक्षा मानकों के नावें तीर्थयात्रियों की जान से खिलवाड़ कर रही थीं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी चैन की नींद सो रहे थे।
कार्रवाई के नाम पर प्रशासन ने रस्म अदायगी करते हुए नाव चालक और लोक निर्माण विभाग (PWD) के ठेकेदार को गिरफ्तार कर ‘गैर इरादतन हत्या’ का मुकदमा दर्ज किया है।
आरोप है कि बिना अनुमति के पॉन्टून पुल हटाया गया। लेकिन असली दोषी कौन है? क्या लोक निर्माण विभाग का पूरा तंत्र इतना पंगु हो गया था कि उसे पुल हटने की भनक तक नहीं लगी? या फिर अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत ने ही इस मौत के खेल को हरी झंडी दी थी?
सच्चाई यह है कि हर बड़ी त्रासदी की तरह इस बार भी छोटे कर्मचारियों को ‘बलि का बकरा’ बनाकर जिम्मेदार अफसर अपनी कुर्सियों को सुरक्षित करने में जुट गए हैं।
यह हादसा प्रशासनिक विफलता, निगरानी के अभाव और भ्रष्टाचार के उस कॉकटेल का नतीजा है जिसने 13 घरों के चिराग बुझा दिए। जब तक जवाबदेही ऊपर बैठे अधिकारियों की तय नहीं होगी, तब तक यमुना के घाटों पर ऐसी त्रासदियां मासूमों की बलि लेती रहेंगी।

