न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा: सत्य का आईना या संस्था की गरिमा पर प्रहार?

न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का संरक्षक स्तंभ है, जो संविधान की रक्षा करता है और नागरिकों को न्याय का आश्वासन देता है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस किताब पर सख्त रुख अपनाते हुए छपाई, वितरण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। किताब के ‘हमारे समाज […]

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ताज महोत्सव: वैश्विक पर्यटन का सपना या महज एक स्थानीय मेला? पुनर्विचार की ज़रुरत

आगरा: 1992 में जिस ताज महोत्सव की नींव एक दूरदर्शी सोच के साथ रखी गई थी, आज वह अपने मूल उद्देश्यों से भटकता नजर आ रहा है। कभी इसे वैश्विक मंच पर हस्तशिल्पियों और कलाकारों को प्रमोट करने के लिए परिकल्पित किया गया था, लेकिन आज यह केवल आगरा के स्थानीय निवासियों के लिए एक […]

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शास्त्रों की विकृति और जातिवाद का उदय: क्या वाकई ब्राह्मण वर्ग ही शोषण का जिम्मेदार है?

भारत का सामाजिक ढांचा प्राचीन काल से ही विविधता से भरा रहा है, जिसमें विभिन्न समुदायों ने अपने-अपने तरीकों से योगदान दिया। इस संरचना में ब्राह्मणों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है, क्योंकि वे समाज के बौद्धिक, आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में ब्राह्मणों […]

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बजट 2026: स्टाइपेंड, सब्सिडी और टैक्स छूट; क्या सरकार ने सच में आम आदमी की मुराद पूरी कर दी या यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है?

1 फरवरी 2026 को संसद में पेश केंद्रीय बजट 2026 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सरकार आर्थिक अनुशासन और जनता की आकांक्षाओं के बीच संकरी राह पर चल रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाषण की शुरुआत ही स्थिरता, निरंतरता और दीर्घकालिक विकास की सोच से की। कोई अप्रत्याशित लोकलुभावन घोषणाओं […]

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मदारी पासी, पासी समाज का गौरव (1860-1931)

पासी समाज का गौरवशाली इतिहास -अंशुल वर्मा पूर्व सांसद हरदोई

नई दिल्ली, फरवरी 07: मदारी पासी आज भी अवध के लोकगीतों और कथाओं में जीवित हैं, लेकिन मुख्यधारा इतिहास में उन्हें कम ही स्थान मिला क्योंकि राष्ट्रवादी इतिहास संभ्रांतवादी नेताओं पर केंद्रित रहा। आंदोलन ने किसान अधिकारों की बहस को मजबूत किया, जो स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों में योगदान दिया। हालांकि, इसका हिंसक स्वरूप […]

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भारतीय राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व: विविधता, प्रतिनिधित्व और प्रभाव की कहानी

भारतीय लोकतंत्र की मूल शक्ति उसकी विविधता, विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, विचारधाराओं और समूहों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संरचना में निहित है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए नेता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आकार देते हैं। इस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय का योगदान केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि नीति-निर्माण, संगठनात्मक राजनीति, विदेश […]

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व्यंग: रीलपुर का उज्ज्वल भविष्य…जब होमवर्क में ‘निबंध’ की जगह मिलेगी ‘स्क्रिप्ट’

रीलपुर ने आखिरकार मान लिया कि भविष्य वही है जो 30 सेकंड में समझ आ जाए और 15 सेकंड में स्किप भी किया जा सके। इसलिए इस बार रीलपुर के बजट में राष्ट्र निर्माण का नया फार्मूला आया है: पहले रील बनाओ, फिर रियलिटी अपने आप बन जाएगी। स्कूलों में अब कंटेंट क्रिएशन लैब्स खुलेंगी। […]

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​नारा या हकीकत? क्या 2047 की राजनीति भारत को दिला पाएगी वैश्विक गुरु का दर्जा?

जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफ़र का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ़ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक़्क़ी की, कितनी सड़कें बनीं […]

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बंद दरवाजों के पीछे सिसकती बुजुर्गियत! रिश्तों की दूरी या बदलता समाज? भीड़ में अकेले पड़ते बुजुर्गों की बढ़ती दुनिया

आगरा में एक फ्लैट के भीतर कई दिनों तक सन्नाटा रहा। दरवाज़ा बंद, अंदर कोई हलचल नहीं। फिर अचानक उठती दुर्गंध ने पड़ोसियों को चौंकाया। दरवाज़ा खुला तो भीतर 78 वर्षीय रिटायर्ड इंजीनियर शैलेंद्र कुमार का शव मिला। पास ही दवाइयां, खाने के पैकेट और रोज़मर्रा का सामान रखा था। ज़िंदगी जैसे धीरे-धीरे चल रही […]

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भावनात्मक शोषण की सामाजिक हकीकत: क्यों रिश्तों में मौन रहने वाला ही सबसे अधिक आहत होता है?

मनुष्य का जीवन रिश्तों के ताने-बाने से ही आकार लेता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सहयोग और सामाजिक संबंध—ये सभी हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करते हैं। किंतु आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में संवेदनशीलता की जगह स्वार्थ ने ले ली है और भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है। […]

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