यूपी 2027 का रण: अखिलेश-चंद्रशेखर के बीच ‘200 सीटों’ का पेच, गठबंधन या सिर्फ सियासी शिगूफा?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नई खिचड़ी पक रही है, लेकिन इसकी आंच इतनी धीमी है कि यह बीरबल की खिचड़ी मालूम पड़ती है। नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने 2027 में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का ‘फॉर्मूला’ तो तैयार कर लिया है, लेकिन अखिलेश यादव के सामने रखी उनकी शर्त ने गठबंधन की राह में कांटों की बाड़ लगा दी है।

दलित वोट बैंक पर नजर और कांशीराम की विरासत

यूपी चुनाव 2027 में दलित मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होने वाली है। मायावती के नेतृत्व में बसपा के सिमटते जनाधार ने बाकी दलों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। जहां अखिलेश यादव 2024 में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए खुद को सबसे बड़ी ताकत साबित कर चुके हैं, वहीं राहुल गांधी अब कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाकर मायावती के गढ़ में सेंध लगा रहे हैं। इस विरासत की जंग में अब चंद्रशेखर आजाद भी मजबूती से खड़े हैं, जिनका मानना है कि सपा-आसपा का मेल ही भाजपा का विजय रथ रोक सकता है।

​’आधा-आधा’ का खेल: 200 सीटों वाली जिद

​चंद्रशेखर आजाद का दावा है कि यदि सपा और उनकी पार्टी हाथ मिला लें, तो भाजपा के लिए वापसी नामुमकिन होगी। लेकिन पेच सीटों के बंटवारे पर फंसा है। सूत्रों और मीडिया गलियारों (रिपोर्टर्स ऑफ एयर) की चर्चाओं के मुताबिक, चंद्रशेखर यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से पूरे 200 सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। उनका तर्क है कि वह अखिलेश यादव को 3 सीटें ‘ज्यादा’ (203 सीटें) देकर बड़ा दिल दिखा रहे हैं।

​इस मांग पर समाजवादी खेमे में जबरदस्त चुटकी ली जा रही है। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि, “चंद्रशेखर भाई से कहिए कि वह बहुत ज्यादा नहीं, बस एक सीट अखिलेश जी के लिए छोड़ दें, बाकी सब खुद ही लड़ लें।”

​पुराना घाव और अपमान का मुद्दा

​अखिलेश और चंद्रशेखर के बीच रिश्तों की बर्फ जमने का यह पहला मामला नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों के बीच बातचीत अंतिम दौर में पहुंचकर टूट गई थी। तब चंद्रशेखर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भावुक होते हुए आरोप लगाया था कि अखिलेश ने उनका अपमान किया है। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद करने वाले चंद्रशेखर ने तब इसे ‘दलितों का अपमान’ करार दिया था।

​बढ़ा कद, पर वही पुरानी शैली

2019 में मायावती ने सपा के कंधे पर चढ़कर शून्य से 10 सीटों का सफर तय किया था, जिसे अखिलेश आज तक नहीं भूले हैं। 2024 में अकेले चुनाव लड़कर बसपा फिर शून्य पर आ गई, जबकि चंद्रशेखर नगीना से भारी मतों से जीतकर संसद पहुँच गए। अब सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर का सियासी कद तो बढ़ा है, लेकिन उनकी गठबंधन की शर्तें आज भी ‘नौ मन तेल’ वाली पुरानी कहावत को चरितार्थ कर रही हैं।

​क्या अखिलेश यादव 200 सीटों का जोखिम उठाएंगे? या चंद्रशेखर आजाद एक बार फिर अकेले अपनी जमीन तलाशेंगे? यूपी की सियासत में फिलहाल सस्पेंस बरकरार है।