अखिलेश का ‘गुर्जर कार्ड’: दादरी से मिशन-2027 का शंखनाद, क्या पश्चिम यूपी में बीजेपी-RLD का गेम बिगाड़ेगी सपा?

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नोएडा/लखनऊ, 11 मार्च 2026: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी दूर है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। अखिलेश यादव ने अपने चुनावी अभियान का आगाज पश्चिमी यूपी के ‘पावर सेंटर’ नोएडा (दादरी) से करने का फैसला किया है। 29 मार्च को होने वाली इस ‘समानता भाईचारा रैली’ के जरिए सपा का सीधा फोकस गुर्जर समुदाय पर है।

क्यों बदला अखिलेश का फोकस?

​पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘अकेले’ लड़ने की है। 2022 में अखिलेश के साथ जयंत चौधरी (RLD) की ताकत थी, लेकिन अब जयंत बीजेपी के पाले में हैं। अखिलेश जानते हैं कि केवल मुस्लिम वोटों के सहारे बीजेपी-आरएलडी के मजबूत गठबंधन को नहीं हराया जा सकता। इसलिए, उन्होंने गुर्जर समुदाय को साधकर बीजेपी के कोर वोटबैंक में सेंधमारी करने की रणनीति बनाई है।

​गुर्जर-मुस्लिम समीकरण: पुरानी यादें ताजा

सियासी जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव के दौर वाले फॉर्मूले को दोहराना चाहते हैं। एक समय था जब सपा की कमान रामशरण दास जैसे कद्दावर गुर्जर नेता के हाथों में थी। रामसकल गुर्जर, नरेंद्र भाटी और वीरेंद्र सिंह जैसे नेताओं ने पश्चिम में सपा को मजबूती दी थी।

अब राजकुमार भाटी और सुधीर भाटी जैसे नेताओं के जरिए अखिलेश फिर से उसी गुर्जर-मुस्लिम गठजोड़ को जिंदा करना चाहते हैं, ताकि वे जयंत चौधरी पर अपनी निर्भरता खत्म कर सकें।

इन सीटों पर पड़ेगा सीधा असर

​पश्चिमी यूपी की करीब दो दर्जन सीटों पर गुर्जर समुदाय निर्णायक भूमिका में है। गाजियाबाद, नोएडा, बिजनौर, मेरठ, सहारनपुर और कैराना जैसे जिलों में गुर्जरों की संख्या 20 हजार से लेकर 70 हजार तक है। यदि सपा इस समुदाय का एक हिस्सा भी अपनी ओर खींचने में सफल रहती है, तो यह बीजेपी के लिए बड़ा झटका होगा।

​बीजेपी के ‘गढ़’ में ललकार

नोएडा और गाजियाबाद को बीजेपी का सबसे सुरक्षित किला माना जाता है। अखिलेश यादव ने दादरी को चुनकर यह संदेश दिया है कि वह रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक राजनीति करेंगे। ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के एजेंडे में गुर्जरों को फिट करके सपा यह साबित करना चाहती है कि वह सर्वसमाज की पार्टी है।