आगरा: सिकंदरा पुलिस हिरासत में हुई राजू गुप्ता की मौत के मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। जहाँ इस मामले में अदालत पहले ही एक दरोगा और शिकायतकर्ता को जेल भेज चुकी है, वहीं अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने उत्तर प्रदेश सरकार और आगरा प्रशासन को सख्त लहजे में अल्टीमेटम दिया है।
आयोग ने निर्देश दिया है कि मृतक के नजदीकी रिश्तेदारों (कानूनी वारिसों) की तत्काल तलाश की जाए और उन्हें 5 लाख रुपये की मुआवजा राशि सौंपी जाए।
मुआवजे की राह में ‘अपनों’ की कमी
हैरानी की बात यह है कि पुलिस रिकॉर्ड में राजू गुप्ता का कोई भी करीबी जीवित रिश्तेदार सामने नहीं आ रहा है। 4 जून 2025 को पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि राजू की माँ रेनू गुप्ता का निधन हो चुका है और फिलहाल कोई अन्य वारिस चिन्हित नहीं हो सका है। इसी तकनीकी कारण से मुआवजा प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।
आयोग की सीधी चेतावनी: “4 हफ्ते में रिपोर्ट दें वरना…”
मानवाधिकार आयोग ने 28 जनवरी को आगरा के जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने चेतावनी दी है कि यदि 4 सप्ताह के भीतर वारिसों की पहचान कर रिपोर्ट नहीं सौंपी गई, तो मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 13 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसमें संबंधित बड़े अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष पेश होना पड़ सकता है।
न्याय की लंबी लड़ाई और सजा का ऐलान
यह मामला वर्ष 2018 का है, जिसे मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिवक्ता नरेश पारस ने आयोग के समक्ष उठाया था।
दरोगा अनुज सिरोही: अदालत ने दोषी मानते हुए 10 वर्ष की जेल की सजा सुनाई है।
शिकायतकर्ता अंशुल प्रताप: मामले में साजिश रचने के लिए 7 वर्ष की सजा दी गई है।
CID जांच: आयोग के हस्तक्षेप के बाद ही इस मामले की जांच सीआईडी को सौंपी गई थी, जिसने पुलिसिया बर्बरता की पोल खोली।
मानवाधिकार कार्यकर्ता का पक्ष
मामले को उजागर करने वाले नरेश पारस ने कहा कि पुलिस हिरासत में दी जाने वाली यातनाएं लोकतंत्र के लिए कलंक हैं। उन्होंने बताया कि राजू के रिश्तेदारों को खोजने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। पारस ने आरोप लगाया कि सजा होने के बावजूद पुलिस की कार्यप्रणाली में मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की कमी आज भी बनी हुई है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है जहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं। अब सबकी नज़रें प्रशासन पर हैं कि वे 4 हफ्ते की समयसीमा में राजू के परिवार का पता लगा पाते हैं या नहीं।

