भारतीय ज्ञान परंपरा का केंद्र बना आगरा का DEI: शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर आत्मिक उन्नति तक, योग को बनाया दैनिक जीवन का आधार

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आगरा: अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर पर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (DEI) में योग, शोध, अनुशासन और मानवीय मूल्यों के अनूठे समन्वय पर आधारित एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संस्थान ने स्पष्ट किया कि योग मात्र शारीरिक आसनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ जीवनशैली, मानसिक स्थिरता, आत्मविकास और आध्यात्मिक उत्कर्ष का मार्ग है।

दयालबाग की कार्यसंस्कृति: योग और सेवा का मेल

संस्थान का मानना है कि “योगः कर्मसु कौशलम्” का सिद्धांत उनकी कार्यसंस्कृति की आधारशिला है। यहाँ प्रतिदिन बच्चों और विद्यार्थियों को योग एवं सरल आसनों का प्रशिक्षण देकर उन्हें अनुशासित दिनचर्या के लिए प्रेरित किया जाता है।

दयालबाग की आध्यात्मिक विरासत में ‘सहज सुरत-शब्द योग’ का विशेष महत्व है, जिसके माध्यम से प्रातःकालीन ध्यान व साधना से मन की एकाग्रता और आंतरिक शांति का विकास किया जाता है।

शारीरिक श्रम और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता

DEI की जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। प्रकृति के सानिध्य में कार्य, जैविक खेती, सौर ऊर्जा का उपयोग और सामुदायिक सेवा-भाव के माध्यम से विद्यार्थियों में सहयोग और उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जाती है। यह कार्यसंस्कृति न केवल शरीर को सक्रिय रखती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक जागरूक नागरिक भी बनाती है।

​शोधार्थियों के अनुभव: शोध नहीं, यह आत्मविकास की यात्रा

इस अवसर पर विभिन्न विभागों के पीएचडी शोधार्थियों ने डीईआई के शैक्षणिक वातावरण पर अपने विचार साझा किए:

संत सरन (भौतिकी विभाग): उन्होंने कहा कि यहाँ शोध करना केवल अकादमिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मविकास की एक यात्रा है, जहाँ निर्देशक एक संरक्षक की भूमिका निभाते हैं।

​ग़ज़ल माथुर (संस्कृत विभाग): उन्होंने कहा कि शोध व्यक्ति के दृष्टिकोण, धैर्य और जीवन को व्यापक रूप से समझने की क्षमता का विकास करता है।

​निकिता सत्संगी: उन्होंने बताया कि पीएचडी की चुनौतियों के बीच संस्थान का सकारात्मक वातावरण और योग-आधारित दिनचर्या मानसिक संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित होती है।

​दीक्षा शर्मा: उन्होंने कहा कि DEI का परिवेश विद्यार्थियों को न केवल उत्कृष्ट शोधकर्ता, बल्कि नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण संवेदनशील नागरिक बनाता है।

पूनम सिंह (संस्कृत विभाग): उन्होंने संस्थान में स्वास्थ्य को दी जाने वाली सर्वोच्च प्राथमिकता और प्रतिदिन योग के अनिवार्य स्वरूप को रेखांकित किया।

​राष्ट्र निर्माण का माध्यम

संस्थान के शोधार्थियों ने सामूहिक रूप से यह संदेश दिया कि जब शिक्षा और शोध में ज्ञान के साथ योग, साधना, सेवा और मानवीय मूल्यों का समावेश होता है, तो वह शिक्षा व्यक्तिगत उपलब्धि के दायरे से बाहर निकलकर समाज और राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन जाती है।