फतेहपुर सीकरी: ऐतिहासिक नगरी फतेहपुर सीकरी में अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के पावन अवसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के निर्देशन में आयोजित किया गया कार्यक्रम इस बार भी महज एक औपचारिक रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गया।
ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और उनके वैश्विक महत्व के प्रति आम जनता में जागरूकता फैलाने के बड़े उद्देश्यों के साथ आयोजित इस कार्यक्रम में केवल विभागीय अधिकारी, कर्मचारी और स्मारक से जुड़े गिने-चुने लोग ही कुर्सियों पर नजर आए।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि जिन आम नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों के लिए यह जागरूकता अभियान था, उनकी भागीदारी कार्यक्रम में लगभग शून्य रही।
इस कार्यक्रम के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा सर्किल के सहायक अधीक्षक जितेंद्र कुमार, सर्किल अधिकारी दिलीप सिंह और सहायक सर्किल अधिकारी अजय मीणा मुख्य रूप से मौजूद रहे। इसके अलावा एएसआई के आंतरिक स्टाफ में एसआईएस सिक्योरिटी इंचार्ज मुकेश यादव सहित गाइड रंजीत चौधरी, इस्माइल खान, नरेंद्र शर्मा, सतीश चंद्र, बबलू कुरैशी, जाकिर, मानसिंह वर्मा, अफसार कुरैशी, शकील कुरैशी, रईस कुरैशी एवं रिजवान कुरैशी सहित कई अन्य अधीनस्थ कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी ही वहां उपस्थित रहे।
विभागीय अधिकारियों की भारी-भरकम मौजूदगी के बावजूद कार्यक्रम स्थल पर स्थानीय आम नागरिकों और छात्र-छात्राओं की मुकम्मल अनुपस्थिति ने इस पूरे आयोजन की प्रभावशीलता और एएसआई की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
मामले को लेकर स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का साफ तौर पर कहना है कि संग्रहालय दिवस जैसे बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अवसर पर पुरातत्व विभाग को सक्रियता दिखानी चाहिए थी। विभाग को सीकरी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी व निजी स्कूलों के बच्चों को विशेष रूप से आमंत्रित करना चाहिए था, ताकि वे फतेहपुर सीकरी स्मारक का मुफ्त भ्रमण कर पाते। इससे हमारी नई पीढ़ी को ऐतिहासिक धरोहरों के गौरवशाली इतिहास और उनके वैज्ञानिक संरक्षण के महत्व की प्रत्यक्ष व व्यावहारिक जानकारी मिल पाती।
स्थानीय निवासियों ने पुरातत्व विभाग पर सीधे तौर पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि यह कार्यक्रम केवल सरकारी फाइलों में उपस्थिति दर्ज कराने और कोरम पूरा करने तक ही सिमट कर रह गया। आयोजन में व्यापक जनसंपर्क और जनजागरूकता की घोर कमी साफ तौर पर दिखाई दी।
लोगों का मानना है कि यदि एएसआई प्रशासन पहले से ही स्थानीय शिक्षण संस्थाओं के साथ उचित समन्वय स्थापित करता और बच्चों के लिए विशेष गाइडेड टूर, क्विज प्रतियोगिता, शैक्षिक सत्र व रचनात्मक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करता, तो इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस का जमीनी प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और प्रेरणादायी हो सकता था।
इस विषय पर इतिहासकारों और विरासत विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक विरासतों के संरक्षण का पवित्र संदेश समाज के धरातल तक तभी प्रभावी रूप से पहुंचेगा, जब देश की नई पीढ़ी को सीधे तौर पर इन अभियानों से जोड़ा जाएगा। इसके लिए महज औपचारिकता निभाने के बजाय नियमित अंतराल पर जमीनी शैक्षिक गतिविधियां, प्रदर्शनियां और स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी वाले विशेष कार्यक्रम आयोजित करना अत्यंत आवश्यक है, जिसका वर्तमान में ऐसे बड़े आयोजनों में साफ तौर पर अभाव नजर आ रहा है।


