आगरा DPS कांड: नाबालिगों की पहचान उजागर होने पर राष्ट्रीय बाल आयोग सख्त; DM से 10 दिन में मांगी रिपोर्ट, पुलिस और स्कूल भी घेरे में

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आगरा। शास्त्रीपुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) में दो नाबालिग छात्रों के बीच शुरू हुआ आपसी विवाद अब एक बड़े राष्ट्रीय, कानूनी और प्रशासनिक संकट में बदल चुका है। इस मामले में नाबालिग बच्चों की पहचान सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होने को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने बेहद गंभीरता से लिया है।

चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट नरेश पारस एडवोकेट की शिकायत पर तुरंत एक्शन लेते हुए आयोग के निदेशक वी. रामानधा रेड्डी ने सीपीसीआर अधिनियम की धारा 13(1) (जे) के तहत मामले में सीधे हस्तक्षेप किया है।

आयोग ने आगरा के जिलाधिकारी (DM) से इस पूरे घटनाक्रम पर अगले 10 दिनों के भीतर एक विस्तृत कार्यवाही रिपोर्ट (Action Taken Report) तलब की है। आयोग के कड़े रुख से साफ है कि नाबालिगों की गोपनीयता भंग करने वाले जिम्मेदार लोगों पर गाज गिरना तय है।

​यूट्यूबर पिता की लापरवाही और FIR का वायरल होना

​इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील और हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया, जब पीड़ित छात्र के पिता जो पेशे से एक यूट्यूबर बताए जा रहे हैं ने सोशल मीडिया पर घटना से जुड़े वीडियो और अन्य जानकारियां सार्वजनिक कर दीं। हद तो तब हो गई जब आरोपी छात्र के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर (FIR) की प्रति भी इंटरनेट पर धड़ल्ले से वायरल हो गई। इस एफआईआर में नाबालिग छात्र का नाम और उसकी पहचान बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।

बाल अधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस ने इसे कानून का खुला उल्लंघन करार दिया है। आयोग को भेजी अपनी शिकायत में उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में बच्चों की पहचान उजागर करना किशोर न्याय कानून (JJ Act) के सख्त खिलाफ है। ऐसा करने से न केवल बच्चों की निजता का हनन होता है, बल्कि उनके मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक भविष्य पर भी हमेशा के लिए गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

​पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल और तीन पुलिसकर्मी सस्पेंड

​घटना की शुरुआत में थाना सिकंदरा पुलिस की कार्यप्रणाली भी गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। शिकायत के मुताबिक, पुलिस ने मामले में अत्यधिक जल्दबाजी दिखाते हुए आरोपी नाबालिग छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2) और 117(2) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। कानून के जानकारों का कहना है कि दोनों पक्ष नाबालिग थे, इसके बावजूद एफआईआर दर्ज करने में संवेदनशीलता नहीं बरती गई और उसकी कॉपी सार्वजनिक हो गई।

हालांकि, जब यह मामला पुलिस के उच्चाधिकारियों के संज्ञान में आया, तो उन्होंने घटना की गंभीरता को देखते हुए त्वरित कार्रवाई की और लापरवाही बरतने वाले तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया।

​जेजे एक्ट की अनदेखी: ट्रेनिंग पर उठे सवाल

एडवोकेट नरेश पारस ने अपने विस्तृत प्रार्थना पत्र में आयोग को बताया कि ‘किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम-2015’ के तहत किसी भी नाबालिग आरोपी या पीड़ित की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके बावजूद आगरा में इस कानून की धज्जियां उड़ाई गईं।

​उन्होंने पुलिस प्रशासन पर तंज कसते हुए कहा कि आगरा पुलिस कमिश्नरेट में हर महीने बाल अधिकारों को लेकर बाल कल्याण अधिकारियों की कार्यशाला (वर्कशॉप) आयोजित की जाती है। कागजी दावों के विपरीत, जमीनी स्तर पर पुलिसकर्मी जेजे एक्ट के प्रति न तो संवेदनशील दिख रहे हैं और न ही प्रशिक्षित।

पारस ने मांग की है कि भविष्य में ऐसी गंभीर गलतियों को रोकने के लिए पुलिस अधिकारियों और निचले स्तर के कर्मियों को बाल अधिकारों तथा किशोर न्याय कानूनों का विशेष और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए।

​जांच के घेरे में डीपीएस स्कूल प्रशासन की भूमिका

इस पूरे मामले में शास्त्रीपुरम स्थित डीपीएस स्कूल प्रबंधन भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। शिकायत में स्कूल प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। नरेश पारस का कहना है कि जब यह पूरा विवाद स्कूल परिसर के भीतर हुआ, तो सुरक्षा व्यवस्था पर नजर डालना बेहद जरूरी है।

​उन्होंने मांग की है कि एक स्वतंत्र और समयबद्ध जांच के जरिए यह पता लगाया जाए कि घटना के समय स्कूल में क्या सुरक्षा इंतजाम थे, विवाद होने के बाद स्कूल प्रशासन ने क्या कदम उठाए और बच्चों की प्राइवेसी बनाए रखने के लिए उनकी तरफ से क्या प्रयास किए गए? इस मामले में स्कूल की प्रशासनिक लापरवाही की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

सोशल मीडिया से सामग्री हटाने और काउंसलिंग की मांग

बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शिकायतकर्ता ने मांग की है कि सोशल मीडिया और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो रहे वीडियो, एफआईआर की कॉपी और अन्य सभी संबंधित सामग्रियों को तत्काल प्रभाव से हटवाया जाए, ताकि बच्चों की पहचान और ज्यादा न फैले। इसके साथ ही, भविष्य के लिए एक स्पष्ट प्रोटोकॉल और डिजिटल कंट्रोल मैकेनिज्म लागू करने की आवश्यकता जताई गई है।

​नरेश पारस ने आयोग से बेहद भावुक और मानवीय अपील करते हुए कहा कि इस विवाद के कारण दोनों नाबालिग छात्र गहरे मानसिक दबाव में हो सकते हैं। इसलिए दोनों बच्चों को तत्काल मनोवैज्ञानिक सहायता, पेशेवर काउंसलिंग और पुनर्वास (Rehabilitation) की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

​”कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो बनेगा खतरनाक ट्रेंड”

​बाल अधिकार कार्यकर्ता ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह मामला सिर्फ दो स्कूली बच्चों की लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में बच्चों की निजता, उनकी गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा के लिए बने पूरे सिस्टम पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

उन्होंने साफ कहा कि यदि इस मामले में दोषियों के खिलाफ कोई कठोर और नजीर बनने वाली (उदाहरणात्मक) कार्रवाई नहीं की गई, तो समाज में सोशल मीडिया ट्रायल, एफआईआर वायरल करने और नाबालिगों को बदनाम करने की यह खतरनाक प्रवृत्ति और बढ़ जाएगी।

बच्चों से जुड़े किसी भी मामले में कानून की संवेदनशीलता और गोपनीयता ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि सिस्टम की एक छोटी सी लापरवाही किसी भी मासूम के पूरे भविष्य को बर्बाद कर सकती है।