नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी तनाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बीजिंग से एक बेहद राहत भरी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बीजिंग में हुई एक बेहद अहम बैठक के बाद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) के दोबारा पूरी तरह खुलने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। व्हाइट हाउस के मुताबिक, दोनों महाशक्तियों के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनी है।
ईरान मुद्दे पर अमेरिका-चीन का साझा रुख
रॉयटर्स ने व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया कि बीजिंग में हुई इस द्विपक्षीय वार्ता में राष्ट्रपति ट्रंप और शी जिनपिंग इस बात पर पूरी तरह सहमत दिखे कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह एक ऐसी शर्त है जिस पर अमेरिका लंबे समय से अड़ा हुआ है। चूंकि ईरान अपनी अर्थव्यवस्था के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर है, इसलिए चीन की इस सहमति को तेहरान (ईरान) के रुख में नरमी लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: क्यों अहम है यह समुद्री मार्ग?
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को हर हाल में खुला और सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
यह दुनिया का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण जलमार्ग है, जहाँ से दुनिया की कुल तेल और प्राकृतिक गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मार्ग के सैन्यीकरण करने और यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का अवैध शुल्क लगाने के प्रयासों का कड़ा विरोध किया है।
ईरान पर प्रभाव डालेंगे जिनपिंग, खरीदेंगे अमेरिकी तेल
सीएनएन (CNN) की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते अपने आर्थिक और राजनयिक प्रभाव का इस्तेमाल करे ताकि इस समुद्री मार्ग की बाधाओं को दूर किया जा सके। इसके अलावा, भविष्य में इस रूट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए शी जिनपिंग ने अमेरिका से तेल की खरीद बढ़ाने में भी दिलचस्पी दिखाई है।
ताइवान पर रणनीतिक खामोशी
इस हाई-प्रोफाइल बैठक के पहले दिन के आधिकारिक बयान में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इसमें ‘ताइवान’ मुद्दे का कोई जिक्र नहीं किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का पूरा ध्यान इस समय वैश्विक तेल संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बहाल कराने पर केंद्रित है। यही वजह है कि उन्होंने जानबूझकर ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे को फिलहाल किनारे रखा, ताकि चीन के साथ बातचीत बेपटरी न हो।
ग्लोबल फाइनेंशियल फर्म जेपी मॉर्गन (J.P. Morgan) ने भी हाल ही में अनुमान जताया था कि वैश्विक तेल संकट को देखते हुए आने वाले हफ्तों में किसी तीसरे पक्ष (जैसे चीन) की मध्यस्थता से इस गतिरोध को सुलझा लिया जाएगा, जिसकी शुरुआत होती दिख रही है।


