नई दिल्ली/आगरा: मानवता और सेवा की मिसाल पेश करते हुए राज्यसभा सांसद नवीन जैन ने संसद में मरणोपरांत देहदान (Body Donation) के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में मानव शरीर की कमी पर चिंता जताते हुए सरकार से देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाने की मांग की।
“परोपकारार्थं इदं शरीरम्”: प्राचीन परंपरा का दिया हवाला
सांसद नवीन जैन ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति के मूल मंत्रों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा त्याग और परोपकार की रही है। शास्त्र कहते हैं ‘परोपकारार्थं इदं शरीरम्’ अर्थात यह शरीर दूसरों के उपकार के लिए ही है। उन्होंने महर्षि दधीचि का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने लोककल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं, आज के युग में ‘देहदान’ उसी सेवा भावना का आधुनिक स्वरूप है।
मेडिकल छात्रों के लिए ‘प्रैक्टिकल’ पढ़ाई की चुनौती
सांसद जैन ने एक गंभीर तकनीकी बिंदु की ओर सदन का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि देश के कई मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में विद्यार्थियों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त मानव शरीर (Cadavers) उपलब्ध नहीं हैं। एक कुशल डॉक्टर बनने के लिए व्यावहारिक अध्ययन अनिवार्य है, जो बिना देहदान के संभव नहीं है। देहदान न केवल चिकित्सा शिक्षा बल्कि भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए भी संजीवनी साबित हो सकता है।
भ्रांतियों को दूर करने की ज़रूरत
समाज में देहदान को लेकर व्याप्त संकोच पर बोलते हुए नवीन जैन ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं और अंतिम संस्कार को लेकर लोगों के मन में कई सवाल और डर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि देहदान एक पूरी तरह कानूनी और सम्मानजनक प्रक्रिया है। किसी भी धर्म में मानवता की सेवा और परोपकार का विरोध नहीं किया गया है, बल्कि इसे ‘महादान’ माना गया है।
सरकार से प्रमुख मांगें:
सांसद नवीन जैन ने केंद्र सरकार के समक्ष निम्नलिखित प्रस्ताव रखे:
व्यापक जागरूकता अभियान: सरकार राष्ट्रीय स्तर पर देहदान के महत्व को समझाने के लिए कैंपेन चलाए।
शैक्षणिक चर्चा: स्कूलों और कॉलेजों में इस विषय पर विमर्श को बढ़ावा दिया जाए।
सम्मान की पहल: देहदान करने वाले परिवारों को सरकारी स्तर पर सम्मानित किया जाए, ताकि समाज में एक सकारात्मक और प्रेरक संदेश जाए।

