जन औषधि दिवस पर बड़ा सवाल: कानून होने के बावजूद डॉक्टर क्यों नहीं लिखते सस्ती जेनेरिक दवाएं? सुप्रीम कोर्ट में 14 अप्रैल को होगी सुनवाई

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आगरा। देश आज शनिवार को आठवां जन औषधि दिवस मना रहा है जिसका उद्देश्य सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जन औषधि केन्द्रों पर उपलब्ध दवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। पिछली 21 दिसंबर को देश में 17,990 जन औषधि केन्द्र थे जहां जेनरिक दवाएं उपलब्ध होती हैं जो कि ब्राण्डेड दवाओं की अपेक्षा 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं लेकिन उसके उपरान्त भी मरीज जेनरिक दवाइयां नहीं खरीदता है क्योंकि चिकित्सक जेनरिक दवाओं को नहीं लिखते हैं। प्रश्न यह है कि जब कानून स्वयं चिकित्सकों को दवा जेनेरिक नाम से लिखने का है, तब देश का आम नागरिक आज भी महँगी ब्रांडेड दवाएँ खरीदने को क्यों विवश है?

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के. सी. जैन यह सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायाालय में वर्ष 2023 में जनहित याचिका दायर की। याचिका के आधार पर केन्द्र सरकार, नेशनल मेमेडिकल काउंसिल, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथाॅरिटी (एनपीपीए) आदि पक्षकारों को न्यायालय ने नोटिस दिया गया और उन्होंने अपने जवाब भी दाखिल किये। अब अगली सुनवाई आगामी 14 अप्रैल को नियत है।

अधिवक्ता केसी जैन का जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन – विधिक स्थिति और तथ्य पर कहना है कि वर्ष 2002 में मेडिकल काउंसिल आफ इण्डिया (एमसीआई) द्वारा बनाए गए व्यावसायिक आचरण संबंधी रेगूलेशन्स की धारा 1.5 में स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक पंजीकृत चिकित्सक दवा जेनेरिक नाम से लिखे।

दिनांक 21.09.2016 को संशोधन द्वारा इस प्रावधान को और अधिक सुदृढ़ किया गया और यह अनिवार्य किया गया कि दवाएँ जेनेरिक नाम से, स्पष्ट एवं पठनीय अक्षरों में लिखी जाएँ। दिनांक 25.09.2020 को नेशनल मेडिकल कमीशन अधिनियम लागू हुआ, जिसकी धाराएँ 60 और 61 के अनुसार पूर्व रेगूलेशन्स को प्रभावी बनाए रखती हैं।

धारा 30 के अंतर्गत ऐसे विनियमों का उल्लंघन व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आता है। दिनांक 23.08.2023 की अधिसूचना द्वारा पुनः स्पष्ट किया गया कि 2002 के रेगूलेशन्स पूर्ण रूप से लागू हैं और बाध्यकारी हैं।

जैन का कहना है कि संसदीय उत्तरों में स्वीकार किया गया है कि जेनेरिक दवाएँ 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। दवाओं की बढ़ी हुई कीमत का सबसे अधिक बोझ निम्न वर्गों पर पड़ता है। जब दवा महँगी लिखी जाती है तो परिवार उपचार अधूरा छोड़ देता है या मरीज आधी दवा खरीदता है या फिर कर्ज लेकर दवा खरीदनी पड़ती है।

यह तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि उल्लंघनों का समेकित केंद्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। नियामक संस्थाओं में रिक्त पदों की स्थिति भी दर्ज की गई है, जिससे प्रवर्तन क्षमता प्रभावित होती है। यद्यपि प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, उनका व्यापक और बाध्यकारी क्रियान्वयन नहीं दिखता। जब निगरानी और अनुशासनात्मक तंत्र सक्रिय न हो, तो वैधानिक प्रावधान व्यवहार में निष्प्रभावी हो जाते हैं।

जन औषधि दिवस का वास्तविक महत्व तभी है जब जागरूकता के साथ-साथ कानून का प्रभावी पालन भी सुनिश्चित हो। यदि जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन का वास्तविक अनुपालन हो जाए, तो करोड़ों नागरिकों को प्रत्यक्ष आर्थिक राहत मिल सकती है और स्वास्थ्य सेवा अधिक न्यायपूर्ण बन सकती है।