उत्तर प्रदेश के आगरा स्थित एसएन मेडिकल कॉलेज से एक बेहद दुखद और सनसनीखेज मामला सामने आया है। कॉलेज की इमरजेंसी के बच्चा वार्ड में शुक्रवार को छत का करीब एक फीट चौड़ा और मोटा प्लास्टर टूटकर 10 वर्षीय मासूम उमैर के ऊपर आ गिरा था। इस भयानक हादसे के तुरंत बाद अस्पताल में कराई गई शुरुआती जांच में बच्चे को कोई अंदरूनी चोट न आने की बात कहकर उसे ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था, लेकिन ठीक अगले दिन यानी शनिवार की सुबह करीब छह बजे अचानक उमैर की इलाज के दौरान मौत हो गई।
दूसरी ओर, अस्पताल प्रशासन का दावा है कि बच्चे की मौत का कारण प्लास्टर गिरना नहीं, बल्कि उसकी पहले से चली आ रही गंभीर बीमारियां थीं। प्रशासन के मुताबिक, मासूम गंभीर निमोनिया, वेस्ट सिंड्रोम और लंबे समय से मिर्गी व दौरों की बीमारी से पीड़ित था। हालांकि, इस दर्दनाक घटना के बाद एक बार फिर अस्पताल की जर्जर हो चुकी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर तीखे सवाल खड़े हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1980 में बनी इस इमरजेंसी बिल्डिंग में पहले भी प्लास्टर और टाइल्स गिरने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
हादसे से चार घंटे पहले ही बदला गया था बेड
उमैर के परिजनों के मुताबिक, बच्चा बचपन से ही गंभीर निमोनिया और दौरे पड़ने की बीमारी से जूझ रहा था और इसी के इलाज के लिए वह एसएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। हादसे से महज चार घंटे पहले ही उसे उस खास बेड पर शिफ्ट किया गया था, जहां अचानक दोपहर के वक्त यह हादसा हुआ। शुक्रवार की दोपहर करीब एक बजे जब बच्चा वार्ड में सन्नाटा था, तभी अचानक तेज आवाज के साथ छत का भारी-भरकम प्लास्टर टूटकर सीधे उमैर के बिस्तर पर आ गिरा। इस तेज आवाज से वार्ड में अफरा-तफरी मच गई और उमैर सीधे तौर पर इस मलबे की चपेट में आ गया।
परिजनों का कहना है कि प्लास्टर इतना मोटा था कि सीधे बच्चे के ऊपर गिरा, हालांकि उस वक्त उसे बाहरी तौर पर केवल मामूली खरोंचें ही आई थीं। घटना के तुरंत बाद अस्पताल के कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली और एहतियात के तौर पर बच्चा वार्ड में भर्ती अन्य सभी 15 बच्चों को तुरंत सुरक्षित रूप से दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद उमैर के सीटी स्कैन समेत कई अन्य जरूरी मेडिकल टेस्ट कराए गए, जिनकी रिपोर्ट में डॉक्टरों ने किसी भी तरह की अंदरूनी गंभीर चोट की पुष्टि नहीं की थी
क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत का काम भी फौरन शुरू करा दिया गया था, और प्रशासन ने सोशल मीडिया पर चल रही उन खबरों को भ्रामक बताया था जिनमें तुरंत किसी की जनहानि होने की बात कही जा रही थी।
17 घंटे बाद तड़के हुई मौत, अस्पताल और परिजनों में ठनी
हादसे के बाद से ही उमैर का इलाज ट्रॉमा सेंटर में चल रहा था, लेकिन शनिवार की सुबह करीब छह बजे अचानक उसकी सांसें थम गईं। दुर्घटना और मौत के बीच करीब 17 घंटे का फासला होने के कारण अब इस पूरे मामले को लेकर परिजनों और अस्पताल प्रशासन के बीच तीखी बहस छिड़ गई है।
एसएन मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि उमैर की शारीरिक स्थिति पहले से ही बेहद नाजुक और गंभीर थी। डॉक्टरों के मुताबिक, उसे महज पांच महीने की उम्र से ही दौरे पड़ते थे और वह वेस्ट सिंड्रोम जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त था। इसके अलावा उसे निमोनिया ने भी जकड़ रखा था। प्रधानाचार्य का तर्क है कि प्लास्टर गिरने से उसे केवल मामूली खरोंच आई थी और अंदरूनी चोट की पुष्टि नहीं हुई थी, इसलिए उसकी मौत गंभीर बीमारी के कारण हुई है और प्लास्टर गिरना महज एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग था।
हंगामा, प्रदर्शन और जर्जर इमारतों पर फिर उठे सवाल
मासूम उमैर की मौत की खबर मिलते ही अस्पताल परिसर में कोहराम मच गया और तनाव की स्थिति पैदा हो गई। घटना की जानकारी मिलते ही सामाजिक कार्यकर्ता बाल योगी मौके पर पहुंचे और उन्होंने सीधे तौर पर अस्पताल प्रशासन पर भारी लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए। इस दौरान इमरजेंसी वार्ड के बाहर जमकर हंगामा और प्रदर्शन भी किया गया।
वार्ड के भीतर मौजूद एत्माद्दौला निवासी राजा खान ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि उनका बेटा भी उसी बच्चा वार्ड में भर्ती था और वे बिल्कुल उसी प्लास्टर वाले बेड के पास बैठे थे। अचानक तेज धमाके के साथ छत का मलबा गिरते देख वे बुरी तरह घबरा गए और उन्होंने फुर्ती दिखाते हुए अपने बच्चे को गोद में उठाकर सुरक्षित बाहर निकाला।
स्थानीय जानकारों का कहना है कि एसएन मेडिकल कॉलेज की यह इमरजेंसी इमारत चार दशक से भी अधिक पुरानी यानी 1980 के दशक की बनी हुई है। इतने लंबे समय में यहाँ वर्ष 2004, 2014 और 2018 में आंशिक मरम्मत कार्य कराए जा चुके हैं, इसके बावजूद इमारत के कई हिस्सों की हालत आज भी बेहद दयनीय और चिंताजनक बनी हुई है।
बाल रोग विभाग में पहले भी इस तरह प्लास्टर गिरने के मामले सामने आ चुके हैं। इस घटना ने एक बार फिर से मरीजों और उनके तीमारदारों की सुरक्षा को ताक पर रखने वाले पुराने अस्पताल भवनों की हकीकत को उजागर कर दिया है। अब यह जरूरी हो गया है कि प्रशासन जल्द से जल्द सभी जर्जर ढांचों का सुरक्षा ऑडिट करवाकर कड़े कदम उठाए, ताकि भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सके।
