आगरा: पुलिस अभिरक्षा में मानवाधिकारों के उल्लंघन और कथित ‘थर्ड डिग्री’ के आरोपों ने आगरा पुलिस की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया मामले में विशेष सीजेएम (CJM) की अदालत ने महिला उत्पीड़न के एक केस में संज्ञान लेते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है।
क्या है सीमा सिकरवार प्रकरण?
पीड़िता सीमा सिकरवार ने आरोप लगाया था कि गिरफ्तारी के दौरान और पुलिस कस्टडी में उसे न केवल शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, बल्कि अभद्र व्यवहार का भी शिकार बनाया गया। अदालत द्वारा कराए गए मेडिकल और पुनः मेडिकल परीक्षण में महिला के शरीर पर चोटों की पुष्टि हुई, जिसे आधार बनाकर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन उपनिरीक्षक सुरजीत सिंह, उपनिरीक्षक नीलेश शर्मा, महिला उपनिरीक्षक नेहा और महिला हेड कांस्टेबल सीमा को आरोपी बनाया है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि पुलिस अभिरक्षा में किसी भी व्यक्ति का उत्पीड़न करना कानून के शासन और मानवाधिकारों के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन है। कोर्ट ने न केवल मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन से एक माह के भीतर विभागीय जांच कर विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है।
आगरा पुलिस के लिए ‘थर्ड डिग्री’ की बढ़ती चुनौती
बीते एक वर्ष में आगरा पुलिस के खिलाफ अभिरक्षा में हिंसा के कई मामले सामने आए हैं, जिन्होंने न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं:
जीवनी मंडी चौकी मामला (जनवरी 2026): दूध विक्रेता नरेंद्र कुशवाह को थर्ड डिग्री देने और नाखून उखाड़ने का गंभीर आरोप लगा, जिसके बाद तत्कालीन चौकी प्रभारी सहित 4 पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज हुआ।
इमरान उर्फ बाबुआ प्रकरण (जून 2025): मुठभेड़ के आरोपी द्वारा पुलिस पर पहले मारपीट और फिर गोली मारने का आरोप लगाया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच दूसरे थाने को सौंपी गई।
किसान राजू शर्मा मामला: किरावली क्षेत्र में किसान का पैर तोड़ने और थर्ड डिग्री देने के मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी सहित तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था।
जवाबदेही पर तेज हुई बहस
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार सामने आ रहे हिरासत में हिंसा के ऐसे मामले पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता को दर्शाते हैं। एक तरफ जहाँ पीड़ित न्याय के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पुलिस विभाग की साख को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच अनिवार्य हो गई है। अदालतों का बढ़ता हस्तक्षेप यह संदेश दे रहा है कि ‘खाकी’ भी कानून से ऊपर नहीं है।


