मणिपुर में ‘बीरेन युग’ का अंत: वाई खेमचंद सिंह होंगे राज्य के 13वें मुख्यमंत्री, जातीय संघर्ष के बीच बीजेपी का बड़ा दांव

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इंफाल। पूर्वोत्तर के लंबे जातीय तनाव के बाद मणिपुर में राजनीतिक पटल पर बड़ा बदलाव आ गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 62 वर्षीय युमनाथ खेमचंद सिंह को राज्य का अगला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है। वह मणिपुर के 13वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे। यह ऐलान बीजेपी विधायक दल की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की मौजूदगी में किया गया।

कौन हैं युमनाथ “वाई” खेमचंद सिंह?

अनुभवी नेतृत्व

वाई खेमचंद सिंह मणिपुर की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। उन्होंने 2013 में राजनीति में कदम रखा और 2017 से सिंगजामेई विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। वे पहले विधानसभा के स्पीकर भी रह चुके हैं और साथ ही महत्वपूर्ण मंत्रालयों का नेतृत्व कर चुके हैं।

साफ और भरोसेमंद छवि

राजनीतिक रूप से उन्हें ऐसा नेता माना जाता है, जिनकी छवि साफ और भरोसेमंद है। वह मैतेई समुदाय से आते हैं, लेकिन कुकी समुदाय सहित दूसरे समुदायों में भी उनकी स्वीकार्यता रही है। दिसंबर में उन्होंने कुकी रिलीफ कैंपों का दौरा किया था और खुले तौर पर शांति बहाल करने की अपील की थी, जिससे उनकी छवि और मजबूत हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

सिंह का काफ़ी पहले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी के भीतर मजबूत नेटवर्क माना जाता है। पार्टी के अंदर उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रख सकता है।

बीजेपी के रणनीतिक फैसले के मायने

बीजेपी ने नया मुख्यमंत्री चुनने का निर्णय ऐसे समय लिया है जब राज्य में सामाजिक-सांस्कृतिक समीकरण बेहद संवेदनशील हैं। दलित, जनजातीय और समुदायों के बीच तनाव की स्थिति में संतुलन और भरोसेमंद नेतृत्व की मांग तेज थी।

एन बीरेन सिंह की अगुवाई में कई बदलाव हुए, लेकिन अब नेतृत्व के हाथ में बदलाव इस रणनीति का प्रतीक है कि पार्टी स्थिरता और शांति को प्राथमिकता दे रही है।

राजनीतिक सफ़र और चुनौतियां

वाई खेमचंद सिंह और एन बीरेन सिंह का राजनीतिक सफर एकजुटता के साथ शुरू हुआ था। 2002 में डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से जुड़े दोनों ने ही राजनीति में कदम रखा था। बाद में बीजेपी से जुड़ते हुए उन्होंने विधानसभा में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

अब खेमचंद सिंह के सामने कई चुनौतियां हैं, जिनमें से सबसे बड़ी अग्निपथ जैसे योजना से उत्पन्न असंतोष और लगातार बनी सामाजिक चुनौतियां हैं। अगर वे इन मुद्दों पर संतुलन बनाकर चलने में सफल रहते हैं, तो मणिपुर की राजनीति में उनका प्रभाव और गहरा हो सकता है।

आगे क्या देखने को मिलेगा?

बीजेपी के लिए यह निर्णय संतुलन, सामुदायिक स्वीकार्यता और राजनीतिक मजबूती का संकेत माना जा रहा है।
वाई खेमचंद सिंह के नेतृत्व में अब देखना होगा कि वे कैसे:
शांति और सामाजिक समरसता बहाल करते हैं
आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों का समाधान करते हैं
और राज्य के लंबे प्रतीक्षित स्थायित्व को कायम रखते हैं
मणिपुर में नया नेतृत्व न केवल स्थानीय राजनीति के लिए, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर की राजनीति के परिदृश्य के लिए भी महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।

चुनौतियों का ‘अग्निपथ’

खेमचंद सिंह को मणिपुर की कमान ऐसे समय में मिली है जब राज्य जातीय संघर्ष की गहरी खाई में गिरा हुआ है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती विस्थापितों का पुनर्वास करना, समुदायों के बीच विश्वास बहाली और कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना है।