UP की राजनीति में उबाल: अखिलेश बोले- ‘शांत संन्यासी’ नहीं ‘करप्ट माउथ’ हैं मुख्यमंत्री, गिनाईं सदन की बदजुबानियां

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लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। सोशल मीडिया पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में अखिलेश ने सीएम योगी की भाषा शैली, उनके पूर्व जीवन और गोरखनाथ मठ के उत्तराधिकार चयन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सपा प्रमुख ने मुख्यमंत्री को “करप्ट माउथ” बताते हुए मर्यादा तोड़ने का आरोप लगाया है।

अखिलेश यादव ने लिखा कि मुख्यमंत्री ने “गुरु समान शंकराचार्य से सर्टिफिकेट की मांग” की, “माता समान वयोवृद्ध महिला को सदन में अभद्र शब्द से संबोधित किया” और अपने से वरिष्ठ सदस्य को “लठैत” कहा। उन्होंने मुख्यमंत्री को “करप्ट माउथ” कहकर संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने नैतिकता और शिष्टाचार की मर्यादा तोड़ दी है।

अपने पोस्ट में सपा प्रमुख ने बुद्धकालीन जातक कथा के “नीले सियार” का उदाहरण भी दिया। उन्होंने लिखा कि जैसे एक सियार नील के टब में गिरकर नीला हो गया और जंगल के जानवर उसे दूत मानकर राजा बना बैठे, लेकिन समय आने पर उसकी असलियत सामने आ गई, वैसे ही आज के मुख्यमंत्री भी बाहरी आवरण से अलग हैं। उनका दावा है कि समय आने पर सच्चाई सामने आती है।

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व जीवन का जिक्र करते हुए लिखा कि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 1994 के आसपास अजय सिंह बिष्ट पारिवारिक परिवहन व्यवसाय में सहयोग करते थे। उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक होने की बात कही गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उसी दौर में उनकी भाषा शैली बनी।

पोस्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत अवैद्यनाथ रिश्ते में भाई थे और बाद में अजय सिंह बिष्ट को मठ में बुलाकर कुछ ही वर्षों में उत्तराधिकारी बना दिया गया। अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि जब मठ में हजारों संन्यासी मौजूद थे, तब उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया। क्या यह केवल योग्यता का निर्णय था या रिश्तेदारी का प्रभाव भी था।

उन्होंने आगे लिखा कि पहले उन्हें मठ की गद्दी सौंपी गई और कुछ ही वर्षों में लोकसभा की सीट भी मिल गई। साथ ही यह प्रश्न भी उठाया गया कि क्या महंत चुनने के लिए कोई औपचारिक चुनाव प्रक्रिया हुई थी और क्या इसे “भगवा परिवारवाद” कहा जा सकता है।

पोस्ट के अंत में अखिलेश यादव ने लिखा, “पद और परिधान तो रिश्तों और समय की मदद से मिल सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार नहीं।”

फिलहाल मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस पोस्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।