लखनऊ। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में गठबंधन की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ‘हैट्रिक’ लगाने की तैयारी में जुटी है, वहीं विपक्षी खेमे में ‘इंडिया’ गठबंधन की राहें आसान नहीं दिख रही हैं। खास तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर जारी कशमकश गठबंधन के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।
जीत का फॉर्मूला: ‘भावुकता नहीं, आंकड़े’
सपा नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि 2027 की चुनावी रणनीति पूरी तरह से ‘विनिंग फैक्टर’ पर आधारित होगी। अखिलेश यादव किसी भी हाल में उन गलतियों को दोहराने के मूड में नहीं हैं, जो अतीत में अन्य राज्यों में गठबंधन की हार का कारण बनीं। सपा रणनीतिकार बिहार विधानसभा चुनाव 2020 का उदाहरण देते हुए सचेत हैं, जहां कांग्रेस को उसकी क्षमता से अधिक सीटें देने का खामियाजा पूरे महागठबंधन को भुगतना पड़ा था। यही कारण है कि सपा ने कांग्रेस से उन सीटों की फेहरिस्त मांगी है, जहां उनका जनाधार मजबूत है, ताकि केवल ‘जीतने वाली सीटों’ पर ही मंथन हो सके।
उपचुनावों की कड़वी यादें
सपा की कार्यशैली का अंदाजा हालिया उपचुनावों से लगाया जा सकता है, जहां कांग्रेस को दी गई सीटें भाजपा के गढ़ वाली थीं, जहाँ जीत की संभावनाएं नगण्य थीं। उस दौरान कांग्रेस ने गठबंधन धर्म निभाते हुए सीटें सपा को वापस कर दी थीं, लेकिन उस घटना ने यह साफ कर दिया था कि सपा, कांग्रेस की चुनावी ताकत का आकलन किस नजरिए से कर रही है।
मुस्लिम वोट बैंक और दलित राजनीति का पेंच
सपा के लिए मुस्लिम वोटों का एकीकरण सबसे बड़ी प्राथमिकता है। पार्टी को डर है कि कांग्रेस को ज्यादा ‘स्वतंत्र स्पेस’ देने से वोटों का बिखराव हो सकता है। इसी बीच, कांग्रेस के दो दलित सांसदों का मायावती से संपर्क साधने की कोशिश ने सियासी पारे को और बढ़ा दिया है। हालांकि कांग्रेस ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए नोटिस जारी किया, लेकिन इस प्रकरण ने गठबंधन के भीतर भरोसे के संकट को उजागर कर दिया है। मायावती ने भी इन सांसदों को भाव न देकर विपक्षी एकजुटता की राजनीति में एक अलग संदेश दिया है।
क्या सपा-कांग्रेस का गठबंधन बच पाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा इस समय एक दोहरी चाल चल रही है। एक ओर वह भाजपा को घेरने के लिए सामाजिक समीकरण साध रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस को गठबंधन में ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका में सीमित रखना चाहती है। कांग्रेस अब एक सहयोगी के बजाय अपनी हिस्सेदारी के लिए सौदेबाजी करती नजर आ रही है।
आने वाले महीनों में सीटों के बंटवारे पर होने वाली बातचीत ही यह तय करेगी कि यह गठबंधन वाकई धरातल पर भाजपा के लिए चुनौती बन पाएगा, या फिर आपसी खींचतान में बिखरकर रह जाएगा।


