कढ़ाई-भगौने कम पड़ गए, ‘चमचे’ ज्यादा हो गए…आगरा भाजपा की नई कार्यकारिणी पर पूर्व पदाधिकारियों के तीखे सोशल मीडिया तंज वायरल

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आगरा। भाजपा महानगर की नवगठित कार्यकारिणी की घोषणा होते ही संगठन के भीतर दबा असंतोष अब खुली बगावत में बदलता दिखाई दे रहा है। नई टीम के ऐलान के साथ ही पार्टी में असंतोष, इस्तीफे, कटाक्ष और आरोपों की आंधी चल पड़ी है।

संगठन में वर्षों तक पसीना बहाने वाले पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को जहां सिर्फ कार्यकारिणी सदस्य बनाकर “सम्मानजनक समायोजन” का प्रयास किया गया, वहीं कई ऐसे नए चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दे दी गईं जिन्हें नेताओं का करीबी या सिफारिशी चेहरा माना जा रहा है। यही “संतुष्टिकरण की राजनीति” अब भाजपा महानगर इकाई पर भारी पड़ती नजर आ रही है।

घोषणा के बाद नगर निगम में पार्षद दल के पूर्व उपनेता मोहन सिंह लोधी और एकता जैन हर्ष ने कार्यकारिणी सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया है। वहीं, बूथ अध्यक्ष से दो बार मंडल अध्यक्ष तक का सफर तय करने वाले भाजपा नेता मनोज बघेल ने केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल, राज्यसभा सांसद नवीन जैन और महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता पर सीधे-सीधे अपनी “राजनीतिक हत्या” करने का गंभीर आरोप लगाया है।

सोशल मीडिया पर भी भाजपा नेताओं के कटाक्ष, तंज और तीखी प्रतिक्रियाएं वायरल हो रही हैं। पार्टी के भीतर यह संदेश तेजी से फैल रहा है कि “जमीन पर काम करने वाले किनारे, नेताओं के चहेते आगे”।

एक साल बाद कार्यकारिणी बनते ही मचा घमासान

विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा में जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष की घोषणा के करीब एक साल बाद कार्यसमिति का गठन हो सका। सोमवार को जारी सूची में शामिल नामों ने पार्टी के भीतर अंतर्कलह की सुगबुगाहट को तेज कर दिया। सबसे ज्यादा नाराजगी उन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में देखी जा रही है, जो पिछले एक साल से महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता के हर कार्यक्रम, आंदोलन और संगठनात्मक गतिविधि में सक्रिय रहे। इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन की रीढ़ बने कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर ऐसे लोगों को पद दिए गए हैं जो केवल चुनावी मौसम में या बड़े नेताओं के दरबार में ही नजर आते हैं।

भाजपा के भीतर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि इस कार्यकारिणी के गठन में संगठनात्मक योग्यता से ज्यादा स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पसंद और सिफारिशें चलीं। लखनऊ से आई सिफारिशों और स्थानीय नेताओं के दबाव में पूरी सूची “न्योछावर” कर दी गई, जिसके चलते समर्पित कार्यकर्ताओं में उपेक्षा का स्वर अब खुलकर सामने आ रहा है।

पूर्व पार्षद व उपनेता पार्षद दल ने फोड़ा गुस्सा

भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व पार्षद और नगर निगम पार्षद दल के पूर्व उपनेता मोहन सिंह लोधी ने कार्यकारिणी में केवल सदस्य बनाए जाने पर तीखी नाराजगी जताते हुए पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पत्र जारी कर नेतृत्व पर समाज और समर्पित कार्यकर्ताओं के अपमान का आरोप लगाया।

मोहन सिंह लोधी ने पत्र लिखकर कहा है कि “आपने मुझे महानगर कार्यकारिणी में सदस्य बनाया है, आपका धन्यवाद। 30 साल लगातार पार्टी की सेवा करने पर भारी-भरकम पद देकर समाज को अपमान करने का काम किया है। पार्टी में वार्ड उपाध्यक्ष, युवा मोर्चा, मंडल प्रभारी, मंडल महामंत्री, मंडल अध्यक्ष, दो बार पार्षद, नगर निगम सदन में सचेतक, मुख्य सचेतक एवं उपनेता पार्षद दल रह चुका हूं। पार्टी सत्ता में नहीं थी, तब दिन-रात की कड़ी मेहनत की थी। आज लोधी समाज को एक भी पदाधिकारी नहीं बनाया गया है। जबकि 99% लोधी समाज भाजपा को वोट करता है। आगरा जिले में लगभग 3.50 लाख वोट लोधी समाज का है।”

“लेकिन लोधी समाज को आज तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली है। हर बार समाज को ठगा सा रह जाता है। भाजपा कहती है ‘सबका साथ, सबका विकास’, लेकिन कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपने गुर्गे सेट करने और अपनों को रेवड़ी बांट दी है। मूल कार्यकर्ताओं का अपमान किया है। इससे क्षुब्ध होकर महानगर कार्यकारिणी से त्यागपत्र देता हूं। मेरा त्यागपत्र स्वीकार करने की कृपा करें।” मोहन सिंह लोधी के इस पत्र ने संगठन के भीतर जातीय प्रतिनिधित्व, समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और ‘गुटबाजी’ की बहस को और हवा दे दी है।

मनोज बघेल का विस्फोटक हमला, छोटे कार्यकर्ता से डर गए बड़े नेता

भाजपा नेता मनोज बघेल, जिन्होंने बूथ अध्यक्ष से लेकर दो बार मंडल अध्यक्ष तक संगठन में लंबा सफर तय किया, उन्होंने फेसबुक पर बेहद तीखा और भावनात्मक पोस्ट लिखकर पार्टी के बड़े नेताओं पर सीधा हमला बोला। उन्होंने केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल, राज्यसभा सांसद नवीन जैन और महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता पर अपनी “राजनीतिक हत्या” करने का आरोप लगाया।

मनोज बघेल का पूरा फेसबुक पोस्ट

“मैं केंद्रीय राज्यमंत्री एसपी सिंह बघेल, राज्य सभा सदस्य नवीन जैन और महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मुझ जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता की राजनीति खत्म करने के लिए पूरी ताकत लगायी, उसके लिए बहुत आभार। नेता नेता का विरोध करें, समझ में आता है और नेता एक छोटे से कार्यकर्ता का विरोध करें, यह समझ नहीं आया। मैंने पिछले 14 वर्षों से संगठन में बूथ से लेकर मंडल अध्यक्ष का कार्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करने का प्रयास किया है। अपने घर और परिवार को छोड़कर पार्टी के लिए पूरे समर्पण भाव से काम किया और आप लोगों ने यह इनाम दिया, इसके लिए पुनः एक बार आभार। हो सकता है कि मैं किसी की चापलूसी नहीं कर पाया, इसलिए मेरे साथ ऐसा किया गया।” मनोज बघेल की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और इसे भाजपा महानगर संगठन में ‘अंदरूनी युद्ध’ का खुला ऐलान माना जा रहा है।

एकता जैन हर्ष ने भी छोड़ा पद

नई कार्यकारिणी में कई वरिष्ठ और पुराने नेताओं को केवल सदस्य बनाकर समायोजित करने की कोशिश की गई, लेकिन यही रणनीति अब संगठन के लिए संकट बनती जा रही है।
एकता जैन हर्ष ने भी कार्यकारिणी सदस्य पद से इस्तीफा देकर साफ संकेत दे दिया है कि यह नाराजगी किसी एक नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर व्यापक असंतोष का रूप ले चुकी है।

सोशल मीडिया पर भाजपा नेताओं के तंज

कार्यकारिणी की घोषणा के बाद भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के सोशल मीडिया पोस्ट ने संगठन की अंदरूनी नाराजगी को सार्वजनिक कर दिया है। कई नेताओं ने नाम लिए बिना, तो कई ने सीधा कटाक्ष कर नई टीम पर सवाल उठाए हैं।

महानगर मंत्री रहे भुवन शर्मा का तंज- “कढ़ाई, भगोने, ढोंगे कम पड़ गए, चमचे इतने हो गए।” यह पोस्ट सीधे तौर पर इस आरोप की ओर इशारा करता है कि संगठन में योग्यता नहीं, चाटुकारिता को तरजीह दी गई।

ममता शर्मा का कटाक्ष- “जय माता दी, कैला देवी पद यात्रा जाते हुए अचानक रास्ते में एक झुनझुना मिल गया।” इस टिप्पणी को संगठन में मिले “छोटे और प्रतीकात्मक पद” पर करारा व्यंग्य माना जा रहा है।

पूर्व मंडल अध्यक्ष अनिरुद्ध भदौरिया का तंज- “संगठन में 35 साल की तपस्या के बाद इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए अध्यक्ष जी का हृदय से आभार।” अनिरुद्ध भदौरिया को भी केवल कार्यकारिणी सदस्य बनाया गया है, और उनका यह पोस्ट व्यंग्यात्मक विरोध के रूप में देखा जा रहा है।

श्याम शर्मा का सीधा सवाल- “22 पूर्व मंडल अध्यक्षों में से क्या एक भी महानगर पदाधिकारी बनने काबिल नहीं था?” श्याम शर्मा का यह सवाल संगठन के भीतर उस बड़े वर्ग की नाराजगी को सामने लाता है जो मानता है कि अनुभवी संगठनकर्ताओं को सुनियोजित तरीके से किनारे किया गया है।

‘चहेतों’ की एंट्री, ‘दिग्गजों’ की छुट्टी?

भाजपा महानगर की नई कार्यकारिणी को लेकर सबसे बड़ा आरोप यही है कि इसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रभावशाली नेताओं के करीबी चेहरों को प्राथमिकता दी गई है। संगठन के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि “जिन्हें जमीन पर कभी काम करते नहीं देखा गया, वे सीधे शीर्ष पदों पर पहुंच गए”।

नवीन गौतम को मंत्री से प्रमोट कर उपाध्यक्ष बनाया गया। उन्हें सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल का करीबी माना जा रहा है। नितेश शिवहरे को सीधे महामंत्री जैसे अहम पद पर लाया गया।

चर्चा है कि वे एमएलसी विजय शिवहरे के भांजे हैं। खास बात यह कि वे इससे पहले महानगर कार्यकारिणी में किसी बड़े पद पर नहीं रहे। महेश शर्मा को महामंत्री बनाया गया। उन्हें आगरा कैंट विधायक डॉ. जीएस धर्मेश का करीबी बताया जा रहा है।

मनवीर चौहान को उपाध्यक्ष बनाया गया। उन्हें एत्मादपुर विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह का करीबी माना जाता है। दीपू जादौन को भी उपाध्यक्ष पद मिला। बताया जा रहा है कि उनकी पहुंच सीधे लखनऊ कार्यालय तक है और वे प्रदेश महामंत्री संगठन के सहयोगी के करीबी हैं। अनिल सारस्वत और नेहा गुप्ता को मंत्री पद मिला। दोनों को राज्यसभा सांसद नवीन जैन का करीबी माना जा रहा है। इन नामों को लेकर कार्यकर्ताओं में सवाल है कि क्या अब संगठन में निष्ठा और संघर्ष की जगह ‘सिफारिश और संपर्क’ ही योग्यता बन गई है?

महिलाओं को दिखावटी प्रतिनिधित्व

नई टीम में उपाध्यक्ष पद पर 7 कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई है, जिनमें 2 महिला चेहरे निधि शर्मा और अनीता खरे शामिल हैं। 8 मंत्रियों की सूची में भी 3 महिलाओं को शामिल कर आधी आबादी को साधने की कोशिश की गई है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि महामंत्री जैसे सबसे प्रभावशाली और संगठनात्मक रूप से निर्णायक पदों पर किसी भी महिला को जगह क्यों नहीं मिली? इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व तो दिया गया, लेकिन “निर्णायक ताकत” से दूर रखा गया।

अतुल गर्ग की एंट्री पर भी चर्चा

नई कार्यकारिणी में अतुल गर्ग को कोषाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। यह नियुक्ति भी चर्चा में है क्योंकि बताया जा रहा है कि अतुल गर्ग ने आगरा उत्तर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर भाजपा प्रत्याशी स्व. जगन प्रसाद गर्ग के खिलाफ चुनाव लड़ा था और हार गए थे। इस नियुक्ति ने भी कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि “जो लोग वर्षों से भाजपा का झंडा उठाए घूम रहे हैं, उन्हें किनारे कर बाहर से आए या विरोधी दल की पृष्ठभूमि वाले लोगों को अहम जिम्मेदारी क्यों?”

कायस्थ, कोली, जाट और लोधी समाज की अनदेखी

सूत्रों के मुताबिक पार्टी ने इस सूची के जरिए शहर की चारों विधानसभाओं में जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है। लेकिन यह कोशिश भी विवादों में घिर गई है। कई नेताओं का आरोप है कि कायस्थ, कोली, जाट और लोधी समाज सहित कई प्रभावशाली वर्गों की उपेक्षा की गई है। विशेषकर लोधी समाज को लेकर उठे सवालों ने संगठन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मोहन सिंह लोधी का पत्र इस असंतोष को और मुखर कर चुका है। अब सवाल यह है कि क्या भाजपा का ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारा संगठन के भीतर ही सवालों के घेरे में आ गया है?

जमीन पर काम करने वाले बनाम दरबारी राजनीति

भाजपा महानगर की नई टीम को लेकर जो नाराजगी फूटी है, वह केवल पदों की लड़ाई नहीं है। असल संघर्ष है जमीन पर काम करने वाले बनाम नेताओं के करीबी चेहरे, पुराने संगठनकर्ता बनाम नए सिफारिशी चेहरे, समर्पण बनाम संपर्क और संघर्ष बनाम चापलूसी। पार्टी के भीतर जो संदेश जा रहा है, वह बेहद गंभीर है। जो वर्षों तक बूथ, वार्ड, मंडल और आंदोलन में खड़े रहे, उन्हें किनारे कर दिया गया; और जो सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहे, वे पदाधिकारी बन गए। यही वजह है कि कार्यकारिणी के गठन के साथ ही संगठन में असंतोष की चिंगारी अब खुली बगावत में बदलती दिख रही है।

सोशल मीडिया पर नाराज़गी अगर संगठनात्मक विद्रोह बनी तो विधानसभा चुनाव से पहले मुश्किलें बढ़ेंगी। फिलहाल दो इस्तीफे सामने आ चुके हैं, कई नेता सोशल मीडिया पर खुलकर नाराजगी जता रहे हैं और कई पुराने कार्यकर्ता अंदरखाने लामबंद बताए जा रहे हैं।

अगर पार्टी नेतृत्व ने जल्द डैमेज कंट्रोल नहीं किया तो यह असंतोष सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मंडल और बूथ स्तर तक संगठनात्मक असर छोड़ सकता है।