कांवड़िये तो बहाना है, उन्मादी भीड़ को हिंसक और बर्बर बनाना है!
गुजरे 35-40 वर्षों, विशेषकर 1992 के बाद के भारत ने जो गंवाया है, उनमे से एक तीज-त्यौहार, यहाँ तक कि धार्मिक पर्व के उत्साह, उमंग से भरपूर उत्सवों से महरूम हो जाना है। ये सब ऐसे अवसर हुआ करते थे, जो चोटी और दाढ़ी और सलीब के फर्क को पीछे छोडकर हर चेहरे पर आल्हाद […]
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