छूटी हुई पाठशाला, छिनते सपने: स्कूल के बाहर खड़ी आधी आबादी…जब बेटियाँ बीच रास्ते लौट आती हैं

भारत में लड़कियों की स्कूली शिक्षा की कहानी आज़ादी के बाद के विकास‑वृत्तांत की सबसे जटिल और मार्मिक कड़ी है। संविधान का अनुच्छेद 21A हर बच्चे को 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, पर ज़मीनी तस्वीर बताती है कि जैसे‑जैसे कक्षा बढ़ती है, लड़कियों की संख्या कम होती […]

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मसूरी में 600 प्रशिक्षु आईएएस और एक सवाल: उंगलियों पर हल होने वाला सवाल और भविष्य के प्रशासकों की तैयारी का सच

मसूरी से उठता सवाल: क्या हमारी प्रशासनिक शिक्षा केवल पुस्तकीय हो गई है? मसूरी में 600 प्रशिक्षु और एक सवाल जिसने सबको सोचने पर मजबूर किया। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी का वास्तविक लक्ष्य: ‘थिंकिंग एडमिनिस्ट्रेटर’ तैयार करना। प्रशिक्षण का अर्थ केवल पाठ नहीं। मसूरी की कक्षाओं में उठा एक छोटा-सा सवाल, बड़ी सीख। […]

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सड़को पर मौत की रफ्तार, सड़क सुरक्षा पर गाल बजाती सरकार

भारत की सड़कों पर हर दिन लगभग चार सौ लोग अपनी जान गंवाते हैं। यह आँकड़ा किसी आपदा या महामारी से नहीं, बल्कि हमारी सड़कों पर व्याप्त अव्यवस्था और लापरवाही से जुड़ा है। अनेक योजनाएँ, अभियान और कानून बनने के बावजूद भारत आज भी दुनिया के सबसे अधिक सड़क दुर्घटना मृत्यु दर वाले देशों में […]

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लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता का प्रश्न और एसआईआर की अनिवार्यता

भारत में चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत उत्सव है। मतदान जनता को अपनी आवाज़ सुनाने और नीतिगत दिशा तय करने का अवसर प्रदान करता है। इस दौरान प्रशासन निष्पक्षता, सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक व्यवस्थाएँ करता है—मतदान केंद्रों की तैयारी से लेकर जागरूकता अभियानों तक। चुनाव आयोग […]

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अख़बारों में बच्चों के लिए जगह कहाँ?—खाली पन्नों पर बचपन की उपेक्षा का सवाल…

रविवार की सुबह बेटे प्रज्ञान को गोद में लेकर अख़बार से कोई रोचक बाल-कहानी पढ़ाने की इच्छा अधूरी रह गई। किसी भी प्रमुख अख़बार में बच्चों के लिए एक भी रचना नहीं थी। समाज बच्चों को पढ़ने के लिए कहता है, पर उन्हें पढ़ने को क्या देता है? यह संपादकीय हमारे समाचार पत्रों की बच्चों […]

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पराली जलाने की आग में झुलसता उत्तर भारत : समाधान किसानों और पर्यावरण दोनों के हित में..

हर वर्ष अक्टूबर–नवंबर के महीनों में पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत की साँसें रोक देता है। पराली जलाना किसानों की विवशता और नीतिनिर्माताओं की विफलता दोनों का परिणाम है। जब तक किसान के हित, कृषि की आवश्यकताएँ और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़कर देखा नहीं […]

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त्योहारों का सेल्फ़ी ड्रामा: जब भक्ति ऑफ़लाइन और दिखावा ऑनलाइन हो गया

अब त्योहार पूजा, मिलन और आत्मिक उल्लास का नहीं, बल्कि ‘कंटेंट’ का मौसम बन गए हैं। दीपक की लौ से ज़्यादा रोशनी अब मोबाइल की फ्लैश में दिखती है। भक्ति, व्रत और परंपराएँ अब फ़िल्टर और फ्रेम में सिमट गई हैं। लोग ‘सेल्फ़ी विद गणेश’, ‘करवा चौथ वाइब्स’ और ‘भाई दूज मोमेंट्स’ जैसे टैग से […]

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करवा चौथ: परंपरा का पालन या रिश्तों की नयी व्याख्या?

प्रेम, आस्था और समानता के बीच झूलता एक पर्व — जहाँ परंपरा भी है, और बदलाव की दस्तक भी। करवा चौथ भारतीय संस्कृति का एक लोकप्रिय पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि इसकी परंपरा प्रेम और समर्पण से जुड़ी है, लेकिन आधुनिक समाज में यह […]

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पूर्वाग्रह से परे: दिव्यांगजन के अधिकारों पर नई बहस

भारत में करोड़ों दिव्यांगजन आज भी शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और सार्वजनिक जीवन में हाशिए पर हैं। संवैधानिक अधिकारों और 2016 के दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के बावजूद सामाजिक पूर्वाग्रह, ढांचागत बाधाएँ और मीडिया में विकृत छवि उनकी गरिमा को चोट पहुँचाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि उनकी समानता और सम्मान से समझौता नहीं […]

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संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक: क्यों माँ बन रही है प्रसूता की पहली मददगार”

अध्ययन बताते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं की देखभाल करने में सास की तुलना में उनकी अपनी माँ कहीं अधिक सक्रिय और संवेदनशील रहती हैं। लगभग 70 प्रतिशत प्रसूताओं को नानी से बेहतर सहयोग मिला, जबकि मात्र 16 प्रतिशत को सास से सहायता मिली। यह बदलाव संयुक्त परिवारों के टूटने और आधुनिक सोच का […]

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