बंद दरवाजों के पीछे सिसकती बुजुर्गियत! रिश्तों की दूरी या बदलता समाज? भीड़ में अकेले पड़ते बुजुर्गों की बढ़ती दुनिया

अन्तर्द्वन्द

आगरा में एक फ्लैट के भीतर कई दिनों तक सन्नाटा रहा। दरवाज़ा बंद, अंदर कोई हलचल नहीं। फिर अचानक उठती दुर्गंध ने पड़ोसियों को चौंकाया। दरवाज़ा खुला तो भीतर 78 वर्षीय रिटायर्ड इंजीनियर शैलेंद्र कुमार का शव मिला। पास ही दवाइयां, खाने के पैकेट और रोज़मर्रा का सामान रखा था। ज़िंदगी जैसे धीरे-धीरे चल रही थी, पर साथ देने वाला कोई नहीं था।

यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बदलते समाज की कहानी कहती है। पिछले महीने सीतापुर के दुर्गपुर में भी ऐसा ही दृश्य सामने आया था, जहां सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी अपने घर में मृत पाए गए। दोनों घटनाएं अलग शहरों की जरूर हैं, पर सवाल एक ही उठाती हैं क्या हमारे बुज़ुर्ग भीड़ में भी अकेले पड़ते जा रहे हैं?

शैलेंद्र कुमार का परिवार था, पर साथ नहीं था। उनका गोद लिया बेटा सेना में है और पुणे में तैनात है। शहर में रहते हुए भी वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी अकेले काट रहे थे। उनकी मौत ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं, रिश्तों की भी होती है।

बदलता परिवार, सिमटते रिश्ते

सामाजिक कार्यों से जुड़े डॉ. आलोक मित्तल मानते हैं कि परिवार की संरचना तेज़ी से बदली है। संयुक्त परिवार टूटे, बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए बाहर गए, और बुज़ुर्ग पीछे छूट गए। पहले घर में उनकी भूमिका केंद्र में होती थी, अब कई बार वे खुद को अतिरिक्त महसूस करने लगते हैं।

अकेलापन धीरे-धीरे असुरक्षा और अवसाद में बदल जाता है।
उनका कहना है कि आज जरूरत ऐसे माहौल की है जहां बुज़ुर्ग सिर्फ रह न रहे हों, बल्कि जुड़ाव महसूस करें। जहां बातचीत हो, दिनचर्या हो, साथ हो।

खामोशी का खतरा

सीएससीडी से जुड़े डॉ. नवीन गुप्ता कहते हैं कि आधुनिक जीवन ने लोगों को व्यस्त तो बनाया है, पर भीतर से खाली भी। बाहर दुनिया भागती दिखती है, भीतर कई लोग रुक चुके होते हैं। बुज़ुर्गों के साथ सबसे बड़ा संकट यही है कि उनकी बातें सुनने वाला कम होता जा रहा है।

वे मानते हैं कि कई बार परिवार साथ होते हुए भी भावनात्मक दूरी बना लेते हैं। हालचाल पूछना औपचारिकता बन जाता है। यह दूरी धीरे-धीरे खतरनाक अकेलेपन में बदल जाती है।

वृद्धाश्रम की नई परिभाषा

आज अच्छे वृद्धाश्रमों की मांग बढ़ना भी इसी बदलाव का संकेत है। इसे सिर्फ मजबूरी के रूप में नहीं देखा जा सकता। कई बुज़ुर्ग अब ऐसे स्थानों को सामाजिक जीवन का विकल्प मानने लगे हैं, जहां दिनचर्या, सुरक्षा और साथ मिलता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सम्मानजनक और सक्रिय वातावरण मिले तो ऐसे केंद्र बुज़ुर्गों के लिए मानसिक रूप से लाभकारी साबित हो सकते हैं।

शहरों को आगे आना होगा

आगरा जैसे शहर, जहां सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां जीवंत हैं, वहां नागरिक समूहों और संस्थाओं की भूमिका अहम हो सकती है। सामुदायिक कार्यक्रम, नियमित हालचाल व्यवस्था, और वरिष्ठ नागरिक नेटवर्क जैसे कदम कई जिंदगियों को बदल सकते हैं।

सहारे की ज़रूरत, दया की नहीं

बुज़ुर्ग बोझ नहीं, अनुभव की पूंजी हैं। उन्हें सिर्फ देखभाल नहीं, जुड़ाव चाहिए। कोई पूछे कि दिन कैसा रहा, कोई सुन ले उनकी बात कई बार इतना ही काफी होता है।

शैलेंद्र कुमार और जावेद फारुकी की खामोश मौतें चेतावनी हैं। अगर समाज ने समय रहते अकेलेपन को गंभीरता से नहीं लिया, तो बंद दरवाज़ों के पीछे ऐसी कहानियां बढ़ती जाएंगी। और तब सवाल यह होगा—क्या हम सचमुच साथ रह रहे हैं, या सिर्फ आसपास?