नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े विवाद में सोशल मीडिया कंपनी व्हाट्सएप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा को बेहद कड़ी चेतावनी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई कंपनी भारत के कानून और संविधान का पालन नहीं कर सकती तो उसे यहां से बाहर चले जाना चाहिए।
निजता और डेटा साझा करने पर सुप्रीम कोर्ट का रुख कड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी और डेटा शेयरिंग के तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा कि टेक्नोलॉजी या व्यावसायिक कारणों के नाम पर नागरिकों की निजता से समझौता नहीं होने दिया जाएगा। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने व्हाट्सएप को कहा, “…हम आपको एक भी डेटा साझा करने की अनुमति नहीं देंगे। अगर आप हमारे कानून का पालन नहीं कर सकते तो भारत छोड़ दें।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि डेटा सुरक्षा और निजता किसी भी कंपनी के लिए ‘वैकल्पिक’ या ‘विकल्प छोड़ने योग्य’ विषय नहीं है। यदि नियम कंपनियों के लिए स्पष्ट नहीं लगते, तो वे भारत में अपनी सेवाएं जारी नहीं रख सकते।
यूजर सहमति और ऑप्ट-आउट तर्कों पर आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने मेटा की दलीलों पर भी आपत्ति जताई, जिसमें कंपनी यूजर कंसेंट और ऑप्ट-आउट विकल्पों का हवाला दे रही है। अदालत ने कहा कि इन तर्कों से निजता को “छल करके छीनने” जैसा परिणाम निकलता है।
न्यायपालिका का यह कहना है कि यूजर की सहमति (कंसेंट) को किसी चालाक़ी से तैयार किए गए नियमों से वैध नहीं ठहराया जा सकता, खासकर जब विकल्प के रूप में दिए गए सिस्टम में असंतुलन और मजबूरी सा माहौल हो।
213 करोड़ रुपये का जुर्माना विवाद का हिस्सा
यह मामला व्हाट्सएप के 2021 के प्राइवेसी पॉलिसी अपडेट से शुरू हुआ था। कंपिटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) ने व्हाट्सएप पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था, यह कहते हुए कि कंपनी ने अपनी प्रभावशाली स्थिति का गलत फायदा उठाया है।
इसके खिलाफ व्हाट्सैप ने NCLAT (नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल) में अपील की थी, लेकिन NCLAT ने CCI के जुर्माने को सही ठहराया। अब व्हाट्सैप ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) को भी पक्षकार बनाया है और 9 फरवरी को अंतरिम आदेश की सुनवाई तय की है।
निजता, सहमति और कानून की पहचान
सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि बड़ी टेक कंपनियां निजता से जुड़े नियम इतने जटिल और चालाक़ी से तैयार करती हैं कि आम नागरिक उन्हें समझ ही नहीं पाते। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि “ऑप्ट-आउट का प्रश्न क्या वास्तविक रूप से मौजूद है।”
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि डेटा साझाकरण या उपयोगकर्ता की सहमति जैसे शब्दों के पीछे छिपे ऐसे उपायों को निजता के अधिकार के खिलाफ खड़ा नहीं किया जा सकता।
यह मामला सिर्फ जुर्माने या नियमों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि निजता के संवैधानिक अधिकार, डिजिटल दुनिया में नागरिकों की सुरक्षा, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़ी एक बड़ी कानूनी लड़ाई में बदल गया है।

