मऊ सदर का सियासी रण: मुख्तार की विरासत और 2027 की चुनौती, क्या अब्बास अंसारी बचा पाएंगे अपना ‘किला’?

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मऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मऊ सदर महज एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि ‘अंसारी परिवार’ के राजनीतिक रसूख का प्रतीक मानी जाती है। पिछले ढाई दशकों से इस सीट की पहचान मुख्तार अंसारी के नाम से जुड़ी रही, जिन्होंने यहाँ से लगातार पांच बार जीत दर्ज की। वर्तमान में उनके बेटे अब्बास अंसारी यहाँ से विधायक हैं, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव की राह उनके लिए पहले जैसी आसान नहीं दिख रही है। मुख्तार अंसारी के निधन के बाद उपजे सहानुभूति फैक्टर और बदलते गठबंधन के दौर में मऊ की जमीन पर वर्चस्व की एक नई जंग छिड़ गई है।

दल बदलते रहे, पर ‘किले’ की दीवारें नहीं हिलीं

मऊ सदर की राजनीति का इतिहास बेहद रोचक है। मुख्तार अंसारी ने यहाँ निर्दलीय, कौमी एकता दल और बसपा जैसे अलग-अलग बैनरों तले चुनाव लड़ा, लेकिन जीत का सिलसिला कभी नहीं थमा। 2022 में यह विरासत अब्बास अंसारी को मिली, जिन्होंने सुभासपा (SBSP) के टिकट पर जीत हासिल की। हालांकि, अब सुभासपा एनडीए (NDA) का हिस्सा बन चुकी है, जिससे ‘टिकट’ और ‘वफादारी’ का पुराना गणित पूरी तरह उलझ गया है।

​सियासी भंवर: जातीय समीकरणों का खेल

मऊ सदर में जीत का सेहरा वही पहनता है जो यहाँ के खास जातीय समीकरणों को साध लेता है । निर्णायक वोट बैंक में यहाँ लगभग 1 लाख मुस्लिम और 1.20 लाख दलित मतदाता हैं। अंसारी परिवार का पारंपरिक आधार यही गठजोड़ रहा है। हालिया नगरपालिका चुनावों में बसपा की जीत ने यह संकेत दिया है कि यह समीकरण अब भी मजबूत है।

मुख्तार की ‘रॉबिनहुड’ वाली छवि का लाभ अंसारी परिवार को हमेशा मिलता रहा है। इस बार सहानुभूति की लहर और जेल में बंद अब्बास अंसारी के प्रति भावनात्मक जुड़ाव क्या रंग लाएगा, यह बड़ा सवाल है।

​बीजेपी और एनडीए की घेराबंदी

इस बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मऊ के इस दुर्ग को ढहाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। पूर्व रनर-अप अशोक सिंह की सक्रियता और स्थानीय स्तर पर ए.के. शर्मा जैसे बड़े चेहरों की चर्चा ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। दूसरी ओर, ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा के करीब 40,000 राजभर मतदाता अगर पूरी तरह एनडीए के पक्ष में गोलबंद होते हैं, तो अब्बास अंसारी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

​चुनौतियां और चुनावी विश्लेषकों की राय

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मुख्तार अंसारी की अनुपस्थिति में यह पहला विधानसभा चुनाव होगा, जिससे मुकाबला बेहद कड़ा होने वाला है। जहाँ विपक्ष दलित-मुस्लिम एकता के भरोसे है, वहीं सत्तापक्ष सवर्णों की नाराजगी दूर करने और पिछड़ा वर्ग के वोटों को एकजुट करने की कोशिश में है। 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि क्या ‘अंसारी’ नाम का जादू अब भी मऊ के मतदाताओं पर कायम है या इस बार यहाँ बदलाव की बयार बहेगी।