मोदी सरकार की उज्जवला योजना निकाल रही गरीबों का दिवाला

अन्तर्द्वन्द

गरीबों के साथ ये कैसा मजाक चूल्हा फूकने पर मजबूर महिलाएं, सबका साथ सबका विकास का दावा खोखला, शो पीस बना उज्जवला गैस सिलेंडर

2017 फतेहपुर की जनसभा: मुझे गरीबों का दर्द पता हैं क्योंकि मेरी मां भी लकडी़ के चूल्हे पर बनाती थी खाना- मोदी, आज ग्रामीण महिलाएं फूक रही चूल्हा

केन्द्र सरकार की लच्छेदार योजनाओं में खोखला साबित दिखी प्रधानमंत्री उज्जवला गैस योजना के माध्यम से भलें हीं ग्रामीण क्षेत्रों में घर घर घरेलू सिलेंडर पहुचा हो लेकिन आज यदि उस पर नजर डाले तो धूल फाकते नजर आ रहें हैं मोटे- मोटे विज्ञापनों वाले पोस्टर और पेपरों ने मानों प्रधानमंत्री मोदी के नूरानी चेहरे को दिखाकर गैस सिलेंडर के दामों में कटौती की हो खैर ये हुआ नहीं था । आज आम आदमी बढ़ती महगाई से जहां जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं वहीं देश की महिलाओं को सम्मान दिलाने की बात करने वाली भाजपा नीति मोदी सरकार कार्पोरेट घरानों की पिट्ठू बनती चली जा रहीं हैं, आज आम सरोकार के मुद्दों से न सरकार को कोई लेना देना हैं न सत्ता की चापलूसी में लगी मीडिया को एक तरफ जहां स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन” के नारे के साथ केंद्र सरकार नें 1 मई 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक सामाजिक कल्याण योजना – “प्रधानमंत्री उज्जवला योजना” की शुरूआत की थी। आज आसमान छूतें गैंस सिलेंडर के भावों ने आंखों से आंसुओं को पोछने के बजाए धुएं के शिकार हो गये हैं इस योजना के पहलुओं पर यदि नजर डाले तो यह योजना एक धुँआरहित ग्रामीण भारत की परिकल्पना करती थी और वर्ष 2019 तक 5 करोड़ परिवारों, विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे रह रही महिलाओं को रियायती एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने का लक्ष्य केंद्र सरकार ने रखा था,इस योजना से एलपीजी के उपयोग में वृद्धि होगी और स्वास्थ्य संबंधी विकार, वायु प्रदूषण एवं वनों की कटाई को कम करने में मदद मिलने की बातें कहीं जा रहीं थी । जैसे तामाम झंझावात बाते की जा रहीं थी  करोड़ों के विज्ञापनों से पट़े सड़क, शहर और पेट्रोल पंपों पर इसके पोस्टर देखने को आज भी मिलते हैं आखिर यह एड्वर्टाइजिंग नहीं तो क्या हैं।

सरकार के करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी गांवों में करीब 20 प्रतिशत से अधिक घरों में महिलाएं चूल्हे पर लकड़ी से भोजन पकाती है। ग्रामीण इलाकों में गरीब तबके के लोग खास करके जो शोषित, वंचित, पीडित हाशिए पर रहने वाला तबका हैं जो कमेरा समाज हैं ओ गैस सिलेंडर की रिफलिंग नहीं करा पा रहा हैं । 8 0 फीसदी घरों में गैस सिलेंडर होने के बावजूद भी गांवों में महिलाएं या तो उसे किसी कोने में ढ़क कर रख दी हैं या उसपर बर्तन रखने का उपयोग कर रहीं हैं या रसूखदारों को बेच दिए है।

सरकार द्वारा चलाई गई उज्ज्वला योजना के तहत हर घर में महिलाओं को धुएं से मुक्त ईंधन से भोजन पकाने के लिए नि:शुल्क गैस कनेक्शन की सौगात दी थी लेकिन सौगात इतनी मंहगी साबित होगी इसकी कल्पना ग्रामीण महिलाएं नहीं की थी। यूपीए की सरकार में जो सिलेंडर 400 के आसपास मिल रहा था वहीं आज 1130 रुपये में मिल रहें हैं जदा कदा लोग ही भरवा पा रहे हैं जो सरकार हमेशा महिलाओं के हक और सम्मान दिलाने की बात करती हैं क्या उसकी यह योजना ढ़ाक के तीन पात नहीं साबित होती दिख रहीं हैं फिर भी आज महिलाएं चूल्हे पर भोजन पका रही है। सरकार की ओर से दिए गए उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन कई लोगों के घरों में महज शोभा बढ़ा रहे है।

लोगों का कहना है कि महंगाई के दौर में पहले ही घर का खर्च चलाना मुश्किल बनता जा रहा है। सरकार ने घरेलू उपयोग में आने वाली वस्तुओं को कंट्रोल रेट पर कर देनी चाहिए। लोगों का कहना कि अधिकतर महिलाओं की आदत गैस चूल्हे पर भोजन पकाने की पड़ गयी है, लेकिन सिलेण्डर का भाव सुनते ही रिफिल करवाने से मना करना पड़ता है। आज घरों में गैस सिलेंडर होने के बाद भी महिलाएं चूल्हे पर लकड़ी से भोजन पकाती मिली। तामाम महिलाओं से जब इस योजना के बारें में बात की तो उन लोगों ने बताया कि जैसे-तैसे मजदूरी कर अपना जीवन यापन चलाते है, मजदूरी में उन्हें उतना अधिक पैसा नहीं मिल पाता है कि घरेलू सामान और गैस का खर्च निर्वहन कर सके।

महिलाओं ने बताया कि उससे तो अच्छा है कि वे चूल्हे से ही काम चला लेते है। ग्रामीण महिलाओं का कहना हैं कि मुझे गैस मिली थी तब बहुत खुशी हुई थी, की अब चूल्हे का उपयोग नहीं करना पड़ेगा, लेकिन उन्हें खुशी तब तक ही मिली जब तक सिलेंडर में गैस रही। उसके बाद चूल्हा ही फूकना पड़ रहा है। ऐसे में अब भी महिलाओं को मिट्टी के चूल्हे पर ही लकड़ी ,कंडे़ और उपलों से खाना बनाना पड़ रहा है। किसान, नौजवान ,और महिलाओं के हित की बाते सरकार चुनावों के ही समय करती हैं उसके बाद ठंडे बस्ते में डाल देती हैं।

बडी़ जोर शोर के साथ 2018 में सात और श्रेणियां जोड़ी गई थी, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना में वर्ष 2016 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताने वाले परिवारों की महिला सदस्यों को कनेक्शन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा था। इसके बाद अप्रैल 2018 में इस योजना का विस्तार कर इसमें सात और श्रेणियों अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, पीएमएवाई, एएवाई, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, चाय बागान, वनवासी, द्वीप समूह की महिला लाभार्थियों को भी शामिल किया गया ,और शामिल भी कर लिया गया धीरे-धीरे लालीपाप देते हुए मिलने वाली सब्सिडी को भी खत्म कर दिया गया , उज्ज्वला योजना की शुरुआत के दौरान सब्सिडी के रूप में लगभग 40 प्रतिशत धनराशि कनेक्शन धारक के खाते में पहुंचती थी। धीरे-धीरे यह धनराशि कम होती चली गई ,समझों कुआं से पानी का जल स्तर धीरे – धीर कम होता गया और अंत सब्सिडी वाला कुंआ ही बंद हो गया । आज महज 17 रुपये ही सब्सिडी के तौर पर नाम मात्र के लिए आ रहे हैं, जो नाकाफी हैं।

योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला, उसके बाद केवल दो बार ही गैस सिलिंडर भरवा पाए हैं। बाद में कीमतें इतनी बढ़ गईं कि गैस से खाना बनाना संभव नहीं रहा ,फतेहपुर 2017 के दौरान जनसभा को संबोधित कर रहें प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि मुझे गरीबों का दर्द पता है क्योंकि मेरी मां भी लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती थी,आज हजारों नहीं कई लाखों गरीब मां चूल्हा फूकने पर मजबूर हैं और धुए का शिकार हो रहीं हैं शायद इसकी चिंता अब केंद्र सरकार को नहीं हैं ।

लेखक – विनोद यादव