आगरा। “किसी भी घर-परिवार की असली तरक्की और खुशहाली बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद और उनकी छत्रछाया में ही फलती-फूलती है। बुजुर्गों के बिना परिवार की कल्पना अधूरी है।” यह प्रेरक विचार बोदला स्थित देवीराम रेस्टोरेंट में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान उभरकर सामने आए। अवसर था ‘अखिल भारतीय महिला परिषद’ (AIWC) की आगरा नगर शाखा द्वारा आयोजित संयुक्त ‘मातृ दिवस’ (Mother’s Day) और ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ (International Family Day) समारोह का, जहां समाज की प्रबुद्ध महिलाओं ने माँ और परिवार के महत्व पर खुलकर मंथन किया।
परिषद की अध्यक्ष उमा सिंह को मिला ‘वरिष्ठ माता’ का गौरव
इस गरिमामयी समारोह के दौरान अखिल भारतीय महिला परिषद की आगरा नगर शाखा की अध्यक्ष उमा सिंह को सर्वसम्मति से इस वर्ष के प्रतिष्ठित ‘वरिष्ठ माता’ के खिताब से नवाजा गया। इस सम्मान को स्वीकार करते हुए उमा सिंह ने भावुक शब्दों में सभी माताओं को बधाई दी और उनसे इस गौरवशाली पदवी के दायित्वों को पूरी निष्ठा के साथ निभाने का आह्वान किया।
संस्मरण और सरप्राइज: जब छलका माताओं का वात्सल्य
कार्यक्रम के अगले चरण में परिषद की सदस्यों ने अपनी माताओं से जुड़े खूबसूरत संस्मरण साझा किए। रूपा मेहरा और वर्षा खन्ना ने अपनी माताओं के साथ बिताए पुराने दिनों की यादें ताजा कीं, तो वहीं चंद्रा मेहरोत्रा और चित्ररेखा कटियार ने भावुक होते हुए बताया कि कैसे इस बार उनके बच्चों ने उन्हें बेहतरीन सरप्राइज देकर इस दिन को उनके जीवन का सबसे यादगार दिन बना दिया।
कामकाजी महिलाओं की सफलता के पीछे ‘सास और दादी’ का संबल
समारोह में संयुक्त परिवार (Joint Family) की अहमियत पर भी विशेष चर्चा हुई। शालिनी चौहान ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी सासू मां को देते हुए कहा, “घर पर मेरी सासू मां की मौजूदगी के कारण मुझे बच्चों या रसोई की कोई चिंता नहीं रहती। इसी पारिवारिक सुख और सहयोग की बदौलत मैं बेफिक्र होकर अपना आर.सी.एम. (RCM) का काम संभाल पाती हूं।”
इसी सुर में सुर मिलाते हुए परिवार परामर्श केंद्र की सीनियर काउंसलर प्रेमलता मिश्रा ने कहा, “अगर मेरे घर में मेरे बच्चों की दादी का सहारा न होता, तो मैं कभी भी घर से बाहर निकलकर ऑफिस जाने और समाज सेवा करने की सोच भी नहीं सकती थी।” रजनी शर्मा ने भी इस बात का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि बुजुर्ग ही परिवार की असली रीढ़ होते हैं।
“मां कोई फरमाइशें पूरी करने वाली मशीन नहीं है”
आरबीएस कॉलेज की पूर्व प्राचार्य डॉ. सुषमा सिंह ने अपनी मर्मस्पर्शी कविता के माध्यम से मां-बेटी के रिश्ते को खूबसूरती से पिरोया “मेरी ममा हैं मेरी बेस्ट फ्रेंड, हममें बड़ा प्यार है और चलती रहती है नोंकझोंक भी… वह न जाने कैसे, बिना बताए ही जान जाती हैं मेरी जरूरतें, मेरी परेशानियां।”
इसके बाद पूनम चौरसिया ने समाज की सोच पर प्रहार करते हुए एक बेहद जरूरी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “यह सच है कि मां पूरे परिवार की धुरी होती है, लेकिन उसे हरफनमौला (all-rounder) समझकर केवल फरमाइशें पूरी करने वाली कोई ‘मशीन’ समझ लेना सरासर गलत है। उसकी भी अपनी भावनाएं हैं, उसे भी कुछ बातें बुरी लगती हैं और वह भी शारीरिक रूप से थकती है। यह बात परिवार के हर सदस्य को गहराई से समझनी होगी।”
आधुनिक युवा पीढ़ी और टूटती पारिवारिक संस्था पर चिंता
कार्यक्रम के समापन सत्र में ममता खन्ना ने आधुनिक जीवनशैली और युवा पीढ़ी के बदलते रुख पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “आजकल के युवा परिवार का दायित्व उठाने से लगातार कतरा रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि उन्हें अब विवाह के पवित्र बंधन में बंधना भी स्वीकार नहीं है। युवाओं की यह सोच भविष्य में ‘परिवार’ नामक हमारी बेहद मजबूत सामाजिक संस्था के अस्तित्व के लिए अत्यंत चिंताजनक है।” इस विचार के साथ उपस्थित सभी महिलाओं ने समाज में पारिवारिक मूल्यों को दोबारा स्थापित करने का संकल्प लिया।


