आगरा पशुपालन विभाग में 25 लाख का ‘गौवंश गबन’: 6 महीने बाद भी ठंडे बस्ते में जांच, रसूखदारों को बचाने का आरोप

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आगरा: उत्तर प्रदेश सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को ठेंगा दिखाते हुए आगरा के पशुपालन विभाग में 25 लाख रुपये के कथित घोटाले का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। निराश्रित गौवंश के लिए आवंटित धन की बंदरबांट के इस संगीन मामले में जांच कमेटी की सुस्ती ने अब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। 6 महीने का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी जांच प्रक्रिया का नतीजा ‘सिफर’ बना हुआ है।

​साजिश के तहत जांच दबाने का आरोप

डिप्लोमा वैटनेरियन एसोसिएशन यूपी के अध्यक्ष डॉ. सतीश चन्द शर्मा ने आरोप लगाया है कि मण्डलायुक्त के कड़े निर्देशों के बावजूद जांच को जानबूझकर अंधेरे में रखा जा रहा है। डॉ. शर्मा का कहना है कि एडीएम (न्यायिक) के नेतृत्व में बनी टीम ने आज तक न तो शिकायतकर्ता को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया और न ही उनके द्वारा दिए गए पुख्ता सबूतों का परीक्षण किया। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि जिन अधिकारियों पर गबन की तलवार लटक रही है, वे अपने प्रभाव से इस पूरी फाइल को दबाने में जुटे हैं।

​नियमों की धज्जियां उड़ाकर ‘सूपरफास्ट’ घोटाला

शिकायत के मुताबिक, इस कथित घोटाले की सबसे बड़ी कड़ी यह है कि 25 लाख रुपये की खरीद के लिए किसी आधिकारिक ‘क्रय समिति’ (Purchase Committee) का गठन ही नहीं किया गया। नियमों को ताक पर रखकर मात्र दो दिन के भीतर ही सामग्री की खरीद, सप्लाई और भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। सवाल यह उठाया गया है कि क्या सरकारी तंत्र में इतनी तेजी सामान्य परिस्थितियों में संभव है? आरोप है कि सितंबर 2024 में खंडित डीएससी (DSC) के जरिए यह पूरा खेल खेला गया।

​इन अधिकारियों पर टिकी है शक की सुई

एसोसिएशन ने इस कथित गबन में आहरण-वितरण अधिकारी डॉ. जयन्त यादव, सीवीओ डॉ. डी.के. पाण्डे, सहायक लेखाकार और केन्द्रीय भण्डार के कैशियर समेत कई कर्मचारियों की संलिप्तता का दावा किया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आरोप अपर निदेशक डॉ. देवेन्द्र पाल सिंह पर है। कहा जा रहा है कि उन्होंने अपनी आंतरिक जांच में गड़बड़ी की बात तो मानी, लेकिन इसकी जानकारी न तो शासन को दी और न ही दोषियों पर कोई कानूनी कार्रवाई की।

लीपापोती का डिजिटल खेल

डॉ. शर्मा ने आईजीआरएस (IGRS) शिकायतों के निस्तारण पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बिना मौके पर गए और बिना शिकायतकर्ता से संवाद किए फर्जी रिपोर्ट सिस्टम में अपलोड कर दी गईं। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की पारदर्शिता के साथ बिंदुवार जांच हो और गौवंश के हक पर डाका डालने वाले ‘सफेदपोशों’ को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए।