नई दिल्ली: दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy Case) से जुड़े मामले में सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में एक हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों ने एक याचिका दायर कर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग की थी। हालांकि, जस्टिस शर्मा ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वह महज धारणाओं के आधार पर केस नहीं छोड़ सकतीं।
जस्टिस शर्मा का कड़ा रुख:
सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि उन्होंने अतीत में कुछ “कड़े फैसले” दिए हैं, वह खुद को सुनवाई से अलग नहीं कर सकतीं। उन्होंने दो-टूक लहजे में कहा, “रिक्यूजल (सुनवाई से हटना) के लिए ठोस आधार होने चाहिए। अगर आपको लगता है कि मैं न्याय नहीं कर पाऊंगी या मैं किसी एजेंसी (CBI/ED) का पक्ष ले रही हूं, तो इसे साबित करने के लिए ठोस तथ्य पेश करें।”
केजरीवाल की दलील: ‘सीबीआई के पक्ष में है ट्रेंड’
अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश वकीलों ने कोर्ट में ‘बार एंड बेंच’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा के पिछले आदेशों में एक विशिष्ट ‘ट्रेंड’ नजर आता है, जहां जांच एजेंसियों की हर बात मान ली जाती है और फैसले उनके पक्ष में आते हैं। केजरीवाल ने सवाल उठाया कि निचली अदालत ने 500 पन्नों के विस्तृत फैसले में उन्हें बरी किया था, लेकिन सीबीआई ने महज 4 घंटे के भीतर हाई कोर्ट में अपील की और जस्टिस शर्मा ने बहुत कम सुनवाई के बाद उस पर रोक लगा दी।
सीबीआई की याचिका पर उठाए सवाल:
केजरीवाल ने दलील दी कि सीबीआई की अपील पूरी तरह त्रुटिपूर्ण है और उसमें ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती देने वाला कोई मजबूत आधार नहीं है। उनके अनुसार, इस अपील को पहले दिन ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय एक व्यापक आदेश पारित कर निचली अदालत के फैसले को रोक दिया गया।
अगली सुनवाई 17 अप्रैल को:
दोनों पक्षों की तीखी दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 अप्रैल की तारीख मुकर्रर की है। तब तक यह सस्पेंस बरकरार है कि क्या जस्टिस शर्मा इस मामले की सुनवाई जारी रखेंगी या केजरीवाल की दलीलों का कानूनी रुख कुछ और होगा।

