काशी-तमिल संगमम के जरिये दक्षिण को साधने की तैयारी में भाजपा

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दक्षिण भारत में कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से घबराई भाजपा

काशी में तमिल समागम के जरिये सियासी जमीन तैयार कर रहे है मोदी

तमिल भाषी राज्यो में हिंदी समागम पर मोदी सरकार की चुप्पी

अमित मौर्या
अमित मौर्या

दक्षिण भारत से शुरू हुई कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का असर हिंदी भाषी राज्यों की ओर बढ़ने लगा है ,इससे घबराई भाजपा अब खुद प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी तथा धार्मिक नगरी से विश्वविख्यात काशी में तमिल समागम का आयोजन कर रही है , बी एच यू के एम्फीथिएटर ग्राउंड में आयोजित करीब एक महीने तक चलने वाले ‘काशी तमिल समागम’ में हर सप्ताह तमिलनाडु से तीन ट्रेनें आएगी। एक ट्रेन में कुल 210 तमिल यात्री मौजूद होंगे । समागम के दौरान 12 समूहों में तमिल लोग काशी आगमन करेंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के 38 जिलों के करीब 3000 प्रतिनिधि इस कार्यक्रम में भाग लेंगे और बनारस के विकास का मॉडल देखेंगे ,इसके बाद इन प्रतिनिधियों का प्रयागराज और अयोध्या का भी दौरा प्रस्तावित है .

भाजपा इस कार्यक्रम को भारतीय सनातन संस्कृति के दो अहम प्राचीन पौराणिक केंद्रों के मिलन मानती है इस दौरान 19 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम के दौरान काशी तमिल संगमम के उद्घाटन समारोह में तमिलनाडु के 12 प्रमुख मठ मंदिर के आदिनम (महंत) को काशी की धरा पर पहली बार सम्मानित किया जाएगा। महामना की बगिया में आयोजित भव्य समारोह में सम्मान समारोह के बाद पीएम मोदी भगवान शिव के ज्योर्तिलिंग काशी विश्वनाथ और रामेश्वरम के एकाकार पर आधीनम से संवाद का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है ।

धार्मिक कट्टरता के लिए तमिलनाडु में जगह नही, तमिल लोग चाहते है धर्मनिरपेक्ष राज्य :

तमिलनाडु की राजनीतिक भूमि पर अपनी सियासी पकड़ को मजबूत करने के लिए भाजपा एकतरफ काशी में तमिल संगमम कर रही है तो दूसरी तरफ तमिल राज्य की राजनीतिक वस्तुस्थिति को भी समझना जरूरी हो जाता है, ऐसी स्थिति में यदि आकलन किया जाय तो तमिलनाडु राज्य के गैर-ब्राह्मणवादी लोग तमिलनाडु को धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में देखना चाहते है , जबकि ब्राह्मणवादी तत्वों के जरिये भाजपा तमिलनाडु में साम्प्रदायिक बीज बोने का हर सम्भव प्रयास कर रही है , हालांकि तमिलनाडु की सियासी पिच पर अपनी राजनीतिक पारी खेलने के लिए भाजपा अभी बहुत पीछे है . राजनीतिक गणित पर यदि गौर किया जाए तो तमिलनाडु की अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां धार्मिक विषयों की राजनीति से परहेज करती है ,बल्कि उनके मुद्दे में स्वास्थ्य शिक्षा,भूख,बेरोजगारी, आदि जनता की मूल जरूरतों वाले विषय होते है ,भाजपा इन मुद्दों पर गैर भाजपा शासित राज्यों को उठाती तो है लेकिन भाजपा शासित राज्यों में खुद शासन में रहने के बावजूद भी इन मुद्दों पर बात करने से बचती है क्योंकि इनके मुद्दों में सबसे शीर्ष पर धार्मिक और सामाजिक विभाजनकारी एजेंडा शामिल रहता है .जिसे तमिलनाडु की राजनीतिक और सामाजिक सरंचना स्वीकार नही करती है .

जब तमिलनाडु में हुआ था पी एम मोदी का खुला विरोध :

तमिलनाडु देश का ऐसा पहला राज्य है जहाँ भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्ववादी विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लगातार विरोध होता रहा है ।

तमिलनाडु में 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य में एक भी सीट नहीं मिली थी . पार्टी 2014 में जीती अपनी एकमात्र सीट भी नहीं बचा पाई. जब भी मोदी तमिलनाडु की यात्रा करते रहे हैं तो यह राज्य उबल-सा पड़ता है. जब मोदी डिफेंस एक्सपो-2018 का उद्घाटन करने चैन्नई पहुंचे थे तो “मोदी गो बैक” के नारों से लोगों ने उनका स्वागत किया था. यही नही जब मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ममल्लापुरम में बैठक के लिए राज्य का दौरा किये तो फिर से यह नारा ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा. तमिलनाडु के कई राजनीतिक दल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने जैसे केंद्र सरकार के फैसलों के मुखर विरोधी रहे हैं.

तमिलनाडु में एआईएमडीएमके ,डीएमके हिंदुत्व विचारों से बिल्कुल अलग पार्टी है ,हालांकि राज्य में कांग्रेस को उसके साफ्ट हिंदुत्व के चलते थोड़ा बहुत स्थान मिल जाता है लेकिन भाजपा के लिए अभी तक तमिलनाडु व गैर हिंदी भाषी राज्यो में सियासी जमीन का अकाल पड़ा हुआ है . भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति का केंद्र अबतक हिंदी भाषी प्रदेश रहे है लेकिन अब धीरे-धीरे भाजपा अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा को अब दक्षिण भारत की ओर बढाने के लिए प्रयासरत है ,लेकिन भाषाई ,संस्कृति और अन्य मुद्दों पर भाजपा की अस्पष्टवादी सोच के कारण दक्षिण भारत में भाजपा को सियासी जमीन मिलना आसान नही दिख रहा है ।

के. कामराज ने जलाई थी शिक्षा की क्रांति ज्योति :

कामराज ने 1953 में तमिलनाडु से तेलुगु भाषी क्षेत्रों को अलग करने के बाद तमिलनाडु की राजनीति पर अपना गढ़ बढ़ाया था और 1954 में राजगोपालाचारी को प्राथमिक शिक्षा की अलोकप्रिय संशोधित योजना के कार्यान्वयन के बाद राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री पद से हटाने में मदद की । कामराज तब स्वयं मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए, और अगले नौ वर्षों तक उस पद पर बने रहेंगे।

तमिलनाडु राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में, के .कामराज ने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया क्योंकि यही वह मुद्दा था जो उनके पूर्ववर्ती के पतन का कारण बना। कामराज के शासन में तमिलनाडु राज्य में 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त कर दी गई तथा 1954 और 1962 के बीच 25,234 स्कूल खोले गए ताकि 500 ​​से अधिक आबादी वाले गांवों में कम से कम एक या अधिक स्कूल हों। उसी समय, माध्यमिक शिक्षा का पुनर्गठन किया गया – गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन को अनिवार्य विषय बना दिया गया, और छात्रों को अपनी पसंद की भाषा के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी सीखने का भी अवसर प्रदान किया गया।

प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में नामांकन 1955 से 1962 तक दोगुना हो गया। 1954 तक, राज्य सरकार ने शिक्षकों के लिए 140 प्रशिक्षण विद्यालय खोले थे। 1955 में, तमिलनाडु सरकार शिक्षकों के लिए भविष्य निधि, पेंशन और बीमा प्रदान करने वाली एशिया की पहली सरकार थी। नामांकन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन के रूप में 1957 में स्कूल मध्याह्न भोजन योजना शुरू की गई। 1960 से शुरू होकर, बच्चों को मुफ्त में स्कूल यूनिफॉर्म प्रदान की जाती थी। राज्य सरकार ने 1958 में स्कूल सुधार आंदोलन को लागू किया जिसके कारण 1963 तक 24,656 स्कूलों को जनता से लगभग 7,93,00,000 रुपये का दान प्राप्त हुआ।

चूंकि तमिलनाडु राज्य सरकार के साथ वहाँ की जनता भी तमिलनाडु में सतत विकास के लिए प्रतिबद्ध है इसलिए विपक्ष की यह मजबूरी बनना स्वाभाविक है कि जनता के जमीनी मुद्दों के बिना वहाँ की राजनीति में भागीदारी दर्ज नही कराई जा सकती है,इसलिए क्षेत्रीय विपक्ष भी तमिलनाडु में साम्प्रदायिक राजनीति को तरजीह नही देता है ,जबकि भाजपा बिना साम्प्रदायिक और विभेदीकरण के अपना एक भी राजनीतिक कदम आगे नही बढ़ा सकती है . इसलिए तमिलनाडु में अपनी सियासी पारी खेलने के लिए भाजपा को लंबी अवधि तक जद्दोजहद करना होगा।

सरकारी खर्चे पर चुनावी इवेंट है ‘तमिल संगमम’ : गणेश शंकर चतुर्वेदी

काशी में तमिल संगमम कार्यक्रम को लेकर बी एच यू के पूर्व छात्र नेता और असि बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक गणेश शंकर चतुर्वेदी का कहना है कि भाजपा और आर एस एस देश और समाज में अच्छे शब्दो को गढ़कर इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करती है लेकिन हकीकत यह है कि इन्हें भारतीय एकता और अखंडता से कोई सरोकार नही है ,काशी में तमिल लोगों के लिए कई मंदिर और मठ है जहाँ तमिल लोग उपेक्षित जिंदगी जीते है ,काशी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र भी है जहाँ तमिल लोगों की बुनियादी सुविधाओं को बतौर सांसद रहते हुए भी प्रधानमंत्री द्वारा नजरअंदाज किया गया ,तमिल संगमम शुद्ध रूप से सरकारी खर्च पर आर एस एस द्वारा आयोजित कार्यक्रम है ,जिसे काशी – तमिल के मैत्री के रूप में प्रसारित किया जा रहा है लेकिन यदि इसके आंतरिक विषय को समझा जाये तो यह आर एस एस द्वारा आयोजित सम्पूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम है . चूंकि दक्षिणभाषी राज्यों में ऐसे कार्यक्रमों को वहाँ के लोगों द्वारा तरजीह नही दी जाती इसलिए प्रधानमंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र को चुना है ताकि जनता के मध्य संदेश जाए . इसमें हैरानी की बात यह है कि बी एच यू जैसे उत्कृष्ट संस्थान में ऐसे कई राजनीतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ,जिसमें संस्थान से जुड़े लोग अपने निजी हित साधने के लिए आर एस एस और भाजपा की राजनीतिक पिच तैयार करने में मदद कर रहे है यह एक उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान का दुर्भाग्य है .

प्रवासी भारतीय सम्मेलन से हो गई किसानों की करीब 16 हेक्टेयर भूमि बंजर :

200 करोड़ की लागत से हुए कार्यक्रम के बावजूद नही मिला प्रवासी सम्मेलन का लाभ :

वर्ष 2019 के जनवरी माह में 21 से 23 जनवरी के दौरान हुए कार्यक्रम प्रवासी भारतीय सम्मेलन की भी थीम काशी तमिल संगमम की तर्ज पर थी ,सरकार और गोदी मीडिया में इस खबर को ऐसे प्रसारित किया जाता था कि प्रवासी भारतीयों के इस सम्मेलन के बाद प्रवासी भारतीय राज्य में निवेश को बढ़ावा देंगे और रोजगार सृजन की कई संभावना पैदा होंगी ।

वाराणसी के ऐढ़े गांव में आयोजित करीब 16 हेक्टेयर भूमि की उपजाऊ मिट्टी को निकालकर प्रवासी नागरिको के लिए बाकायदा टेंट सिटी भी बसाया गया था लेकिन जमीनी हकीकत यह सामने आई कि अब उस भूमि पर कोई भी फसल पैदा नही होती है .

-up18news

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