वाशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाने वाले कानून के तहत प्रस्तावित अतिरिक्त और भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) के प्रावधानों को फिलहाल रोक दिया है। ट्रंप ने शुक्रवार को इस संबंध में एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर कर दिए। व्हाइट हाउस द्वारा स्पष्ट किया गया है कि यह महत्वपूर्ण निर्णय पूरी तरह से अमेरिका के व्यापक राष्ट्रीय हित (National Interest) को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता था। इसका मकसद रूस की कमाई पर रोक लगाकर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए उसकी फंडिंग को मुश्किल बनाना था।
खास बात यह है कि ट्रंप ने 9 अक्टूबर को ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डीजल खरीदने का समझौता किया था।
रूस से तेल-गैस खरीदने पर प्रतिबंध हटा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए ‘रूस और ईरान पर प्रतिबंध’ लगाने संबंधी कानून के अमल पर रोक लगा दी है। ट्रंप ने शुक्रवार शाम जारी एक शासकीय आदेश में कहा, ” मैं ग्राहम कानून में निर्धारित ऐसे प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे रहा हूं।” ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस को एक प्रमाणपत्र सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि इस समय कानून के अमल पर रोक लगाना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध’ लगाने संबंधी कानून ट्रंप को मॉस्को पर व्यापक प्रतिबंध लगाने और रूस से सबसे अधिक तेल एवं गैस खरीदने वाले देशों, जिनमें चीन और भारत शामिल हैं, पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है।
ट्रंप के फैसले से क्या बदलेगा?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों से छूट दी है। ट्रंप ने शुक्रवार रात जारी एक कार्यकारी आदेश में कहा कि कुछ प्रतिबंधों को लागू नहीं करना अमेरिका के ”राष्ट्रीय हित” में है।
ट्रंप ने कहा, ”मैं ग्राहम कानून के तहत ऐसे प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे रहा हूं।” उन्होंने कहा कि उन्होंने अमेरिकी संसद को एक प्रमाणपत्र सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि इस समय ऐसी छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।
‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम’ ट्रंप को मॉस्को पर व्यापक प्रतिबंध लगाने और रूस से सबसे अधिक तेल एवं गैस खरीदने वाले देशों, जिनमें चीन और भारत शामिल हैं, पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इस कानून को ग्राहम कानून के नाम से जाना जाता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाता, तो भारतीय निर्यातकों और दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर असर पड़ सकता था। ऐसे में ट्रंप का यह कदम भारत के लिए राहत की संभावना पैदा करता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि छूट का मतलब सभी प्रतिबंधों का पूरी तरह खत्म होना नहीं है। भारत को वास्तव में कितनी राहत मिलेगी, यह आदेश की शर्तों और लागू किए जाने वाले प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी कांग्रेस ने 16 सितंबर को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम’ पारित किया था। इसके दो दिन बाद, 18 सितंबर को राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया था। इस प्रावधान ने भारत जैसे देशों के लिए चिंता बढ़ा दी थी, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदता है।
धारा 115 बनी राहत का आधार
ग्राहम कानून की धारा 115 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि यदि प्रतिबंधों, पाबंदियों या शुल्कों में छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में हो, तो वह ऐसा कर सकते हैं। ट्रंप ने इसी प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि वह कानून की धारा 112 और 113 के तहत निर्धारित उपायों तथा अपने आदेश में शामिल कुछ शुल्कों को लागू करने से छूट दे रहे हैं। वहीं, धारा 113 रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों अथवा रूस को प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान करती है।
रूस के साथ डीजल समझौते के बीच फैसला
ट्रंप का यह कदम ऐसे समय आया है, जब कुछ दिन पहले उन्होंने रूस के साथ अमेरिका और वैश्विक बाजारों के लिए डीजल की आपूर्ति को लेकर समझौता किया था। ऐसे में प्रतिबंधों से जुड़े प्रावधानों में छूट देने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और अमेरिका की रूस नीति को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
जयशंकर पहले ही उठा चुके थे मुद्दा
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर रुबियो के साथ बैठक के दौरान ग्राहम कानून को लेकर चिंता जताई थी। समझा जाता है कि जयशंकर ने रुबियो को बताया था कि भारत की तेल रिफाइनरी मुख्य रूप से मध्यम श्रेणी के सल्फरयुक्त कच्चे तेल के प्रसंस्करण के लिए तैयार की गई हैं जिसकी आपूर्ति पश्चिम एशिया के देशों और रूस से होती है। उन्होंने रुबियो को यह भी बताया था कि वेनेजुएला से भारी ग्रेड का कच्चा तेल मिलता है, जबकि अमेरिका से हल्के ग्रेड का कच्चा तेल आता है।
तेल की सप्लाई और महंगाई से भी जुड़ा है मामला
भारत की रिफाइनरियों में इस्तेमाल से पहले इन्हें दूसरे तेल के साथ मिलाना होगा। ईरान युद्ध के कारण पश्चिम एशिया के देशों से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है।
रुबियो के भारत दौरे से पहले बढ़ी अहमियत
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के प्रस्तावित भारत दौरे से कुछ ही दिन पहले आया यह फैसला दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत पहले ही रूसी तेल खरीद और संभावित अमेरिकी टैरिफ को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर चुका है।
