यूपी 2027 चुनाव से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विपक्ष से ज्यादा अपने ‘नाराज और घर बैठे कार्यकर्ता’ बने चिंता का सबब

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने इस समय एक ऐसी गंभीर आंतरिक चुनौती खड़ी है, जिसका सीधा नाता उसके अपने सांगठनिक ढांचे और जमीनी कार्यकर्ताओं से है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए इस वक्त विपक्षी दलों की रणनीतियों से ज्यादा चिंता का विषय अपने ही घर के भीतर नाराज और निष्क्रिय होकर घर बैठ चुके वे कार्यकर्ता हैं, जिनके दम पर पार्टी ने सत्ता का यह मुकाम हासिल किया है।

लगातार एक दशक से प्रदेश की सत्ता में काबिज रहने के दौरान संगठन के भीतर गुटबाजी का दायरा बढ़ा है और जनप्रतिनिधियों के आसपास चाटुकार व अवसरवादी तत्वों का जमावड़ा लग गया है। इस स्थिति ने पार्टी के मूल कैडर और नेतृत्व के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है। अब पार्टी नेतृत्व को इस बात का स्पष्ट अहसास होने लगा है कि यदि समय रहते इस आंतरिक असंतोष और नाराजगी को दूर नहीं किया गया, तो चुनावी मैदान में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

सत्ता के गलियारों में बढ़ा अवसरवादियों का वर्चस्व

भाजपा की राजनीतिक ताकत हमेशा से उसका वैचारिक और समर्पित कैडर रहा है। बूथ से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक पार्टी का ढांचा ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं के पसीने से खड़ा हुआ है, जिन्होंने कभी पद या सत्ता की लालसा रखे बिना संगठन के लिए दिन-रात काम किया। लेकिन, लगातार सत्ता में बने रहने के कई नकारात्मक पहलू भी सतह पर आए हैं।

​सांसदों, विधायकों, जिलाध्यक्षों और अन्य प्रमुख पदाधिकारियों के इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिनकी राजनीतिक निष्ठा और सक्रियता केवल सत्ता के साथ बदलती रहती है। ये चाटुकार तत्व जनप्रतिनिधियों को खुश रखने और अपना व्यक्तिगत उल्लू सीधा करने में माहिर होते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्षों से पार्टी का झंडा ढोने वाले पुराने और समर्पित कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर और उपेक्षित महसूस करने लगे।

संवादहीनता और स्थानीय नेतृत्व की बेरुखी

पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि अब जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार सांगठनिक पदाधिकारियों तक उनकी पहुंच पहले जितनी सहज नहीं रही। जिन लोगों ने पार्टी के संघर्ष के दिनों में अपनी जवानी खपाई, उन्हें अब तवज्जो नहीं मिलती, जबकि नेताओं के आसपास मंडराने वाले नए और मौकापरस्त चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है।

​यह नया घेरा धीरे-धीरे इतना प्रभावशाली हो गया है कि पुराने कार्यकर्ता अपनी वाजिब बात कहने में भी असहज महसूस करने लगे हैं। इसका सीधा असर संगठन की जमीनी सक्रियता पर पड़ा है। कई पुराने कार्यकर्ता पार्टी के अभियानों, बैठकों और कार्यक्रमों से दूरी बनाकर चुपचाप घर बैठ गए हैं। हालांकि, वे वैचारिक रूप से आज भी भाजपा से कटे नहीं हैं, लेकिन स्थानीय नेतृत्व के उपेक्षापूर्ण रवैये ने उनकी सक्रियता को जरूर ठप कर दिया है। चुनावी राजनीति में केवल बड़े नेताओं के चेहरे और भाषण काफी नहीं होते, बल्कि बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता ही असली रीढ़ होते हैं, यही बात भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।

​जिलों में आपसी गुटबाजी और वर्चस्व की जंग

​प्रदेश के कई जिलों में पार्टी के भीतर पनपी गुटबाजी ने सांगठनिक एकजुटता को बुरी तरह प्रभावित किया है। सांसदों, विधायकों और स्थानीय क्षत्रपों के अपने अलग-अलग लॉबी और समर्थक समूह बन गए हैं। कई जगहों पर आपसी शीतयुद्ध और खींचतान के कारण संगठन की सामूहिक ताकत बिखरती नजर आ रही है। यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी, तो इसका सीधा असर उम्मीदवारों के चयन, चुनाव प्रचार और सबसे अहम ‘बूथ प्रबंधन’ पर पड़ सकता है।

​पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब ऐसे संवेदनशील जिलों की सूची तैयार कर उन पर विशेष फोकस कर रहा है, जहां आपसी मतभेद चुनावी संभावनाओं को पलीता लगा सकते हैं। डैमेज कंट्रोल के तहत बड़े नेताओं को जिलों में भेजकर स्थानीय दिग्गजों और नाराज कार्यकर्ताओं से सीधी बातचीत कराई जा रही है। कोशिश यह है कि व्यक्तिगत अहंकार, नाराजगी और वर्चस्व की इस लड़ाई को पार्टी हित में जल्द से जल्द खत्म कराया जाए।

भड़ास निकालने का मौका और आरएसएस की एंट्री

भाजपा नेतृत्व की रणनीति केवल सतही तौर पर समझाने-बुझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नाराज कार्यकर्ताओं को अपनी शिकायतें और मन की भड़ास खुलकर निकालने का पूरा अवसर दिया जा रहा है। नेतृत्व का यह आकलन है कि वर्षों से दिल में जमा गुबार और नाराजगी बाहर निकलने के बाद ऐसे कार्यकर्ता एक बार फिर ऊर्जा के साथ संगठन के काम में जुट सकते हैं। पार्टी को पूरा भरोसा है कि वैचारिक रूप से जुड़े पुराने कार्यकर्ता अंततः पार्टी के साथ ही खड़े मिलेंगे, क्योंकि उनकी नाराजगी पार्टी या विचारधारा से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर मिले अपमानजनक व्यवहार से है।

​इस पूरे मिशन में प्रदेश के वरिष्ठ मंत्रियों व पदाधिकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के जिला व प्रांतीय स्तर के पदाधिकारियों को भी सक्रिय कर दिया गया है।

संगठन और संघ के बीच बेहतरीन समन्वय स्थापित कर उन तमाम कार्यकर्ताओं तक पहुंचने का ताना-बाना बुना जा रहा है, जो लंबे समय से निष्क्रिय हैं। इस पूरी कवायद का मकसद केवल नाराजगी को शांत करना नहीं, बल्कि चुनाव से ठीक पहले संगठन की मूल ऊर्जा, आत्मीयता और कार्यशैली को दोबारा बहाल करना है।

तीन महीने का अल्टीमेटम और आगे की राह

भाजपा के पास अब समय बेहद कम और काम बहुत बड़ा है। आने वाले तीन महीने सांगठनिक दृष्टि से पार्टी के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ जैसे होंगे। इस अल्प अवधि में उसे नाराज कार्यकर्ताओं को मनाना, जिलों में फैली गुटबाजी को समाप्त करना और जनप्रतिनिधियों तथा पुराने कैडर के बीच टूटे संवाद को फिर से जोड़ना होगा।

चुनावी समर में कार्यकर्ता केवल भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह मतदाता और पार्टी के बीच सबसे मजबूत और भरोसेमंद संपर्क सूत्र होता है। यदि वही कड़ी कमजोर पड़ जाए, तो दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी भी लड़खड़ा सकती है। भाजपा नेतृत्व इस सच्चाई को भली-भांति समझ रहा है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि पार्टी का यह ‘डैमेज कंट्रोल’ अभियान कितना असरदार साबित होता है और क्या चुनाव की घोषणा से पहले नेताओं और कैडर के बीच की इस गहरी खाई को पाटने में भाजपा सफल हो पाती है या नहीं।